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Saturday, July 10, 2010

ग़ज़ल कहने की ख़ता माफ़ हो...।

अब अपना किसको कहोगे मियां मुस्कान तुम,
कि ज़माना देखके, पकड़े खड़े हो कान तुम।

लो भुगतो, कि आ गई मुफ़लिसी तुम पर,
तमाम उम्र तो बघारते रहे हो शान तुम।

तुम चबाते हो अपने होंठ परेशां होकर,
लोग समझते हैं खाते हो बहुत पान तुम।

एक मासूम सा बच्चा तुम्हारे भीतर है,
इस बच्चे की न ले लेना, कभी जान तुम।

मैं भला तो जग भला, अमां यार छोड़ो भी,
सूरत से दिखते हो, या वाकई हो नादान तुम।

रोटी, कपड़ा और मकान, बातों से नहीं मिलते हैं,
बड़े ठाठ से रहते हो बना के ख़्वाबिस्तान तुम।

ना रोते ना हंसते हो, ना हिलते ना डुलते हो,
सच को सुनकर गोया हो गए कब्रिस्तान तुम।।

8 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल

Udan Tashtari said...

बेहतरीन अनुराग!! वाह!

M VERMA said...

सुन्दर खयालों की गज़ल
बहुत खूब

Aadarsh Rathore said...

छा गए भाई मुस्कान तुम

sanu shukla said...

एक मासूम सा बच्चा तुम्हारे भीतर है,
इस बच्चे की न ले लेना, कभी जान तुम।
बहुत उम्दा ग़ज़ल....!!

Praveen said...

wow gr8 dear

Anonymous said...

kya khoob kahe muskan