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Monday, June 4, 2012

जेब का छेद देखें या ओज़ोन का...


      अगर आपको याद नहीं कि आज पर्यावरण दिवस है तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। आप अपराधबोध से मुक्त रहिए। दरअसल दुनिया में आकर जीने की वचनबद्धता और जीवन का जहर पीने की व्यस्त दिनचर्या में जहां अपने बच्चों के नाम, बीवी का जन्मदिन, शादी की सालगिरह और अपने ही हस्ताक्षर याद नहीं रहते तो पर्यावरण दिवस की क्या बिसात। पर्यावरण दिवस कोई सास-बहू का टीवी सीरियल तो है नहीं जो उसका रिपीट टेलीकास्ट याद रखा जाए और न ही वो किसी समस्या को छू-मंतर करने के लिए किसी बाबा का बताया गया कोई ऊलजलूल उपाय है जो उसे आत्मसात किया जाए। और वैसे भी अब हमारे लिए मूर्ख दिवस के अलावा कोई दिवस प्रासंगिक नहीं रहा।

      इसके बावजूद भी पर्यावरण दिवस के लिए गौरव की बात है कि उसपर निबंध लिखे जाते हैं, वृतचित्र बनते हैं, बड़े-बड़े मंत्री उस पर भाषण देते हैं, तमाम राष्ट्रीय और अंतर्राष्यट्रीय संस्थाएं इस दिवस पर बड़े-बड़े सेमीनार करके व्यथित हो उठते हैं। कोई इससे आगे भले ही कुछ ना करे लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए ब्लॉकबस्टर माहौल तो बन ही जाता है न। इससे ज्यादा सीरियस होने में अपना ही घाटा है। अरे साहब, हम इतने मूर्ख भी नहीं हैं। आज पर्यावरण को बचाने के लिए पेड़ लगाएंगे तो कल रहेंगे कहां? पता नहीं हमारा लगाया पेड़ कल किस बहुमंज़िला इमारत या फ्लाईओवर के रास्ते का रोड़ा बन जाए। न जाने कौन सा पेड़ भविष्य में विकास का मार्ग अवरुद्ध कर दे। पेड़ तो अब जंगलों में भी नहीं रहे तो इन्हे अपने आसपास क्या लगाना। वो तो मनी का लालच ना होता तो हम तो मनी प्लांट भी न लगाते।

      देखिए साहब, बुरा मत मानिए लेकिन हमारे लिए ओजोन की परत में बड़े हो रहे छेद से ज्यादा चिंताजनक हमारी जेब में बड़े होते जा रहे छेद हैं। माना कि नदियां सूख रही हैं और हमें इसके लिए कुछ करना चाहिए लेकिन पहले हम अपने घर के सूखे नल से तो निपट लें। घर का पर्यावरण बचाएं तो बाहर जाएं न। यहां अपनी चिंता में बीपी हाई हुआ पड़ा है आप कहते हैं पर्यावरण की चिंता करो। कल ही तो बेटे ने पर्यावरण बचाओ विषय पर निंबध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता है, और आप कहते हैं हम पर्यावरण को लेकर गंभीर नहीं हैं। अब पर्यावरण दिवस का कॉन्सेप्ट किसी वैलेंटाइन जैसे संत ने नहीं बनाया है तो इसमें हमारी क्या गलती। सॉरी पर्यावरण दिवस।   
(आज 05-05-2012 को अमर उजाला में प्रकाशित)

6 comments:

Shah Nawaz said...

ज़बरदस्त कटाक्ष :-)

पेड़ हैं तो जीवन है!

M VERMA said...

वाकई यह जेब का छेद तो ओजोन के छेद से ज्यादा खतरनाक हो गया है

बेहतरीन

शिवम् मिश्रा said...

जेब का छेद ही देख लो भईया ... ओज़ोन का तो दिखने से रहा ...

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - दुनिया मे रहना है तो ध्यान धरो प्यारे ... ब्लॉग बुलेटिन

uthojago said...

अब पर्यावरण दिवस का कॉन्सेप्ट किसी वैलेंटाइन जैसे संत ने नहीं बनाया है तो इसमें हमारी क्या गलती। सॉरी पर्यावरण दिवस। great

आशा जोगळेकर said...

जेब का छेद कम कर के देखेंगे तो ओजोन का भी कम होगा ।

dharmasankat said...

आशा जोगळेकर said...
जेब का छेद कम कर के देखेंगे तो ओजोन का भी कम होगा ।

very good comment