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Monday, June 4, 2012

जेब का छेद देखें या ओज़ोन का...


      अगर आपको याद नहीं कि आज पर्यावरण दिवस है तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। आप अपराधबोध से मुक्त रहिए। दरअसल दुनिया में आकर जीने की वचनबद्धता और जीवन का जहर पीने की व्यस्त दिनचर्या में जहां अपने बच्चों के नाम, बीवी का जन्मदिन, शादी की सालगिरह और अपने ही हस्ताक्षर याद नहीं रहते तो पर्यावरण दिवस की क्या बिसात। पर्यावरण दिवस कोई सास-बहू का टीवी सीरियल तो है नहीं जो उसका रिपीट टेलीकास्ट याद रखा जाए और न ही वो किसी समस्या को छू-मंतर करने के लिए किसी बाबा का बताया गया कोई ऊलजलूल उपाय है जो उसे आत्मसात किया जाए। और वैसे भी अब हमारे लिए मूर्ख दिवस के अलावा कोई दिवस प्रासंगिक नहीं रहा।

      इसके बावजूद भी पर्यावरण दिवस के लिए गौरव की बात है कि उसपर निबंध लिखे जाते हैं, वृतचित्र बनते हैं, बड़े-बड़े मंत्री उस पर भाषण देते हैं, तमाम राष्ट्रीय और अंतर्राष्यट्रीय संस्थाएं इस दिवस पर बड़े-बड़े सेमीनार करके व्यथित हो उठते हैं। कोई इससे आगे भले ही कुछ ना करे लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए ब्लॉकबस्टर माहौल तो बन ही जाता है न। इससे ज्यादा सीरियस होने में अपना ही घाटा है। अरे साहब, हम इतने मूर्ख भी नहीं हैं। आज पर्यावरण को बचाने के लिए पेड़ लगाएंगे तो कल रहेंगे कहां? पता नहीं हमारा लगाया पेड़ कल किस बहुमंज़िला इमारत या फ्लाईओवर के रास्ते का रोड़ा बन जाए। न जाने कौन सा पेड़ भविष्य में विकास का मार्ग अवरुद्ध कर दे। पेड़ तो अब जंगलों में भी नहीं रहे तो इन्हे अपने आसपास क्या लगाना। वो तो मनी का लालच ना होता तो हम तो मनी प्लांट भी न लगाते।

      देखिए साहब, बुरा मत मानिए लेकिन हमारे लिए ओजोन की परत में बड़े हो रहे छेद से ज्यादा चिंताजनक हमारी जेब में बड़े होते जा रहे छेद हैं। माना कि नदियां सूख रही हैं और हमें इसके लिए कुछ करना चाहिए लेकिन पहले हम अपने घर के सूखे नल से तो निपट लें। घर का पर्यावरण बचाएं तो बाहर जाएं न। यहां अपनी चिंता में बीपी हाई हुआ पड़ा है आप कहते हैं पर्यावरण की चिंता करो। कल ही तो बेटे ने पर्यावरण बचाओ विषय पर निंबध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता है, और आप कहते हैं हम पर्यावरण को लेकर गंभीर नहीं हैं। अब पर्यावरण दिवस का कॉन्सेप्ट किसी वैलेंटाइन जैसे संत ने नहीं बनाया है तो इसमें हमारी क्या गलती। सॉरी पर्यावरण दिवस।   
(आज 05-05-2012 को अमर उजाला में प्रकाशित)

Sunday, May 27, 2012

महंगे पैट्रोल के लिए थैंक यू


      अरे भाई, पैट्रोल महंगा होने का केवल एक ही तो नकारात्मक पहलू है और कि वो महंगा हो गया है वरना तो पैट्रोल अब विलक्षण प्रतिभावान हो गया है। इसकी महत्ता अब सुदूर पर्वत पर विलुप्त होती जा रही किसी जड़ी-बूटी से भी ज्यादा बढ़ गई है। पैट्रोल अब सिर्फ पैट्रोल नहीं रहा अपितु ये अब कई गुणों की खान हो गया है। सरकार को अब जल्द से जल्द पैट्रोल को राष्ट्रीय औषधि घोषित कर देना चाहिए।

      ज़रा सोचिए, अब पैट्रोल छिड़ककर आत्महत्या करने के मामलों का प्रतिशत कितनी तेजी से घटेगा। यही नहीं भविष्य में घासलेट, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ाकर सरकार आत्महत्या के मामलों की आशंकाओं का जड़ से उन्मूलन करने का मन बना रही है। सरकार बड़ी दूरदर्शी है। एक लीटर पैट्रोल को सात सौ पचास एमएल की बीयर की बोतल से ज्यादा मंहगा करने के पीछे सरकार की मंशा डिंक एंड ड्राइव पर नकेल कसने की भी है। अब किसी के लिए भी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना और मदिरापान करना, एक ही दिन में मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। अब किसी पब में जाकर बीयर पीने से ज्यादा शान की बात है पैट्रोल पंप जाकर गाड़ी में पैट्रोल भरवाना। पैट्रोल, गरीबी रेखा की सीमा निर्धारण के पुनर्मूल्याकन में करामाती द्रव्य भी साबित हो सकता है। पैट्रोल भरवा पाने में सक्षम गरीबी रेखा से ऊपर की कैटेगरी में आएंगे और न भरवा पाने वाले गरीबी रेखा से नीचे की। मुझे इस फार्मूले के हिसाब से ये देश अमीरों का देश नज़र आने लगा है।

जो आलोचक ये कहते फिर रहे हैं कि अब खून सस्ता और पैट्रोल महंगा हो गया है, उन्हे सरकार करारा जबाब दे सकती है कि खून तो हमेशा से सस्ता ही रहा है। या तो ब्लड बैंकों में मुफ्त निचोड़ा और दिया जाता है या फिर सड़क पर बह जाता है। गरीब का खून पसीना बनकर हवा तक हो जाता है। लेकिन पैट्रोल के साथ ऐसा नहीं है। पैट्रोल, आम आदमी के खून से ज्यादा बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ है, एक्सक्लूसिव है, अमूल्य है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी खून की नहीं, पैट्रोल की कीमत मायने रखती है।

इसलिए, पैट्रोल के बढ़े हुए दामों का विरोध करना छोड़िए। अब पैट्रोल भरवाने से पहले मीटर में ज़ीरो भले ही मत देखिए अपितु महंगा पैट्रोल भरवाते समय अपने स्टेटस में लग रहे अगिनत चांदों को देखिए और इतराइए। बर्दाश्त करने के साथ-साथ आपकी महंगा खरीदने की क्षमता भी तो बढ़ रही है। इसके लिए सरकार को थैंक यू बोलिए। गुस्से में अपना खून जलाने से तो बेहतर है गाड़ी में पैट्रोल जलाना, कम से कम गाड़ी आपको लेकर किसी मंज़िल पर तो पहुंचेगी।

(आज 28-05-2012 को अमर उजाला में प्रकाशित)

Thursday, May 24, 2012

अपने तो स्वाभिमान की यात्रा निकलती है

     (आज 25-05-2012 को हिन्दुस्तान में प्रकाशित)

      थोड़ा कन्फ्यूज़ हूं कि ये स्वाभिमान के लिए यात्राओं का युग है या मन का वहम है। क्योंकि यात्रा निकालने लायक स्वाभिमान किसी में बचा ही कहां है। यहां तो मंहगाई और भ्रष्टाचार ने पहले ही सबके स्वाभिमान की यात्रा निकाली हुई है। वैसे भी आजकल समाज इतना सुरक्षित नहीं बचा कि स्वाभिमान साथ लेकर सड़क पर निकलने का रिस्क उठाया जाए। चेन और मोबाइल स्नेचिंग के बाद अब स्वाभिमान स्नेचिंग की बारी है। स्वाभिमान को लेकर आने वाले समय में लूटपाट मचा करेगी मैं बता रहा हूं। जिसका अपना स्वाभिमान परचुन की दुकान के उधार खाते में ज़ब्त हो चुका होगा वो जरूरत पड़ने पर दूसरे से लूटे स्वाभिमान को औने-पौने दाम में बेचकर ही काम चला पाएगा। देख लेना, स्वाभिमानी आदमी का मदाम तुसाद में मोम का पुतला लगा करेगा। यानि स्वाभिमान को मोम के पुतलों से संगरक्षित करने का नया युग कॉल बेल बजा रहा है।

      जमाना इतना बदल गया है जी कि कभी यात्रा से नमक निकला था और अब नमक के लिए गरीब की अंतिम यात्रा निकलती है। अब नमक के लिए स्वाभिमान बेचने का ज़माना है। सालों पहले बंगारू लक्ष्मण ने न बेचा होता तो आज उन्हे कौन जानता भला। भोग-विलास के लिए आस्था का स्वाभिमान बेचकर लोग स्वामी हो लिए हैं। अपराध की डिग्री लेकर लोग जेल मंत्री हो लिए हैं। मैच फिक्सिंग के लिए क्रिकेट का स्वाभिमान बेचकर कितने ही खिलाड़ी क्रिकेट एक्सपर्ट बन गए। पहले घर में रखा कबाड़ बेचकर भी नमक मिल जाता था, अब स्वाभिमान बेचकर भी मुश्किल से मिलता है। वजह ये कि इधर नमक की खपत बढ़ गई है, पहले नमक आटे में खाया जाता था अब नमक में आटा खाया जाता है। स्वाभिमान बेचने की दौड़ में हम स्विस्ट्ज़रलैंड तक जा पहुंचे हैं और वहां हमने दूसरों से लूटा स्वाभिमान स्विस बैंक में जमा भी करा दिया है।

अब सवाल ये कि जब स्वाभिमान नहीं बचेगा तो बेचेंगे क्या? देखिए साहब, बेचने वालों को कोई टेंशन नहीं है। वो अपनी पर आ गए को देश भी बेच देंगे। अपनी खैर तो खरीदने वाला मनाए, जिसका रिकॉर्ड सिर्फ परचुन की दुकान के उधार खातों में मिलेगा। इसलिए तो कह रहा हूं कि मौजूदा हालात को देखते हुए यात्रा से स्वाभिमान के वापस मिलने की उम्मीद करना डॉन को पकड़ने जैसा है।
(आज25-05-2012 को हिन्दुस्तान में प्रकाशित)

Saturday, May 12, 2012

मुद्दों की रुपहली फ़िल्म ना बन जाए ‘सत्यमेव जयते’


       (दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 13-05-2012 को प्रकाशित)
 
         आमिर के सत्यमेव जयते को लेकर फ़ेसबुक और ट्विटर पर ज़ोरदार प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई है। प्रतिक्रिया मिलीजुली है, कुछ लोगों को ये शो अभी से सार्थक लग रहा है जबकि कुछ देखने वालों को इसमें कुछ ऐसा नहीं मिला जिसकी इस शो के प्रोपेगैंडा से तुलना और अपेक्षा की गई थी। कहीं ये शो राष्ट्रीय मुद्दों को स्पेशल इफेक्ट्स से सजाकर तैयार की गई ईस्टमैनकलर फिल्म बनकर न रह जाए। कहीं ऐसा न हो कि न्यूज़ चैनलों पर ऐसी ख़बरों से बोर हो चुके लोग अब स्टार प्लस पर नए तामझाम के साथ अपने देश के ज्वलंत मुद्दों का फिल्मीकरण देखें, बस।

आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं इस शो को लेकर किसी भी तरह के पूर्वानुमान से ग्रसित नहीं हूं और न ही मैं आमिर और उनकी इस पहल का विरोधी ही हूं। मेरी चिंता बस इतनी सी है कि ये कोशिश बस लोगों की वाह-वाह तक सीमित न रह जाए। केवल चाय की चुसकियों के साथ इसकी तारीफ़ के अलावा भी लोग अपना योगदान दें, जिसकी संभावनाएं कम हैं। कई लोग कह सकते हैं कि आमिर के बहाने एक पहल हुई ये क्या कम है, लेकिन समझना ये होगा कि क्या वाकई किसी पहल को बहाने की ज़रूरत है और सबसे बड़ी बात ये कि आखिर कितनी बार सिर्फ पहल होकर दम तोड़ देगी। सामाजिक सरोकारों और ज्वलंत मुद्दों पर ये कोई पहला चर्चित शो नहीं है।  

      आमिर की इस शो में मौजूदगी जहां इस शो के लिए टीआरपी का फंडा सोची गई होगी वहीं यही शो का माइनस प्वॉइंट न बन जाए। सोचा गया होगा कि आमिर जब कहेंगे तो दुनिया सुनेगी, लेकिन सच ये है कि आमिर की उपस्थिति ने शो को फिल्मी कलेवर दे दिया है। अत्याधिक स्पेशल इफेक्ट्स में मुद्दे की गंभीरता, किरदार की स्वाभिकता, मौके की नाज़ुकता, स्थान की सजीवता और स्टोरी की आत्मा भी प्रभावित हुई है। सब नकली सा लगता है। फिल्मी लगता है। आमिर को ध्यान रखना चाहिए था कि वो तारे ज़मी पर या लगान का सीक्वल नहीं बना रहे हैं बल्कि देश के ज्वलंत मुद्दों को लेकर एक जनजागरण अभियान की मुहिम छेड़ रहे हैं। हां, बेशक़ आमिर का ये शो सामाजिक सरोकारों की जुड़ी पत्रकारिता को ग्लैमराइज़ करता है। लेकिन आमिर के बहाने लोगों के सिर्फ ध्यान आकर्षित करने को इसकी सफलता नहीं माना जा सकता। शो में ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया जा रहा जिसे लोग पहले से नहीं जानते थे। इसलिए ये सवाल बड़ा बन जाता है कि इसका ओवर ऑल इम्पैक्ट क्या होगा? आमिर की अभिनय क्षमता का एक और वाह-वाह करने वाला पहलू या आमिर के कंघों पर रंग दे बंसती जैसी क्रांति का क्रेडिट?

            आमिर बेहतरीन फ़िल्में देते हैं। उन्हे अगर अपने सामाजिक सरोकारों का हवाला ही देना था तो बेहतर होता वो सत्यमेव जयते नाम से एक फ़िल्म ही बना देते। ऐसे तो वो न ठीक तरह से मुद्दों का फिल्मीकरण ही कर पाए और न ही अपने फिल्मी अनुभव का सामाजिक मुद्दों के साथ सामंजस्य ही बिठा पाए। मामला गड्डमड्ड हो गया। अखबार और न्यूज़ चैनलस् ऐसे तमाम मुद्दों की ख़बर दिखाकर भी गाली खाते हैं लेकिन आमिर की इसी काम के लिए पीठ थपथपाई जाएगी क्योंकि उनके शो में सब गुडी-गुडी है। हैप्पी एंडिग है। न्यूज़ वाले शायद इसलिए गाली खाते हैं क्योंकि वो विचलित कर देने वाली असली तस्वीरें दिखाते हैं, बिना स्पेशल इफेक्ट्स के साथ।

      आमिर निराश न हों, उनका शो इतना होपलैस केस भी नहीं है। लोग तारीफ़ तो कर ही रहे हैं। लेकिन सवाल फिर वहीं की धमाका टीआरपी से शो की लोकप्रियता तो सुनिश्चित की जा सकती है लेकिन शो अपने मूल मकसद में कितना कामयाब हो पाएगा ये कहना बड़ा मुश्किल है। जहां किसी न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर किसी भी ज्वलंत मुद्दे की रिपोर्टिंग करते हुए उस मुद्दे से जुड़े सवालों का जवाब संबंधित अधिकारी अथवा विभाग से लेने की ज़िद में थानों, चौकियों, जेलों, मंत्री निवासों और पीएमओ के बाहर भूखा-प्यासा डटा रहता है और अंततः जवाब लेकर ही दम लेता है, उन मुद्दों को लेकर आमिर इस शो के अंत में कहते हैं कि वो अमुक विषय से संबंधित अधिकारी को इस विषय में कार्यवाई करने के लिए चिट्ठी लिखेंगे। उनके इसी क्लोज़िंग नोट से शो की सार्थकता का आकलन किया जा सकता है। जहां दो अहम मुद्दों को लेकर अन्ना और रामदेव को सकड़ों पर निकलकर अनशन करके संघर्ष करना पड़ रहा है, वहां अगर आमिर की चिट्ठी काम कर जाए तो बात ही क्या है।

इससे पहले भी सामाजिक सरोकारों पर लोगों की सहानुभूति बटोरते किरण की कचहरी टाइप कई शो हिट हो चुके हैं लेकिन नतीजा क्या निकला? क्या शो जिन समस्याओं पर आधारित रहे आज उन समस्याओं के ग्राफ़ में गिरावट आई? शायद नहीं। इसलिए कह रहा हूं कि आमिर कुछ बेहतर कर सकते थे। होना केवल ये है कि आज आमिर के शो के आलोचकों का मुंह पीटने वाले कल किसी और शो में बिज़ी हो जाएंगे और मूल समस्याएं मूल में ही रह जाएगीं। फिर आमिर की तरह कोई आकर उन पर नया शो बनाएगा। समस्याएं वही, शो वही, बस विज्ञापन बदलते रहेंगे।

      निराशाजनक ये भी है कि बड़ी-बड़ी कंपनियां आमिर जैसे बड़े नामों के साथ जुड़कर अपने और शो के व्यवसायिक लाभ के लिए हमेशा तैयार रहती हैं लेकिन सामाज के फायदे के लिए कभी उन गैर सरकारी संस्थाओं के साथ नहीं आतीं जो सही मायनों में तमाम गंभीर समस्याओं को लेकर पीड़ितो के कंघे से कंघे मिलाकर संघर्ष कर रहे हैं। अब तो उम्मीद बस ये की जा सकती है कि जैसे लोगों को अपने सामान्य ज्ञान का लाभ नौकरियों के रूप में कम और कौन बनेगा करोड़पति में भाग लेकर हज़ारों और लाखों जीत कर ज़्यादा मिला वैसे ही आमिर के इस शो से किसी एक या दो पीड़ित परिवार को आमिर की वजह से तवज्जो मिल जाए। वरना जो मुद्दे सत्यमेव जयते में उठाए जाने हैं उनसे समाज को पूरी तरह निजात दिलाने की दिशा में निस्वार्थ भाव और योगदान से अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। दुष्यंत का एक शेर याद आ रहा है- सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। आमिर का शो इसी दिशा में एक पहल बन पाए तो मैं अपने इस समालोचनात्मक आकलन के लिए माफी मांग लूंगा।
(दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 13-05-2012 को प्रकाशित)

Thursday, May 10, 2012

गंगा नहीं नहाऊंगा, बस क्लीन चिट चाहिए


     सोच रहा हूं, मैं भी अपने पाप धो लूं। मुझे भी अपने लिए एक क्लीन चिट की जुगाड़ करनी है। क्लीन होने के मामले में चिट का कोई जवाब नहीं है। अगला पूछता है, लागा चुनरी में दाग छिपाऊं कैसे? जवाब मिलता है, क्लीन चिट से। पहले पाप धोने के लिए गंगा नहाने या बहती गंगा में हाथ धोकर भी वैतरणी पार करने का कॉन्सेप्ट था। लेकिन अब सीन दूसरा है। अब गंगा में डुबकी लगाने से बड़े से बड़ा पापी भी कतराता है। राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते। पहले पापियों के पाप धो-धोकर गंगा मैली हुई और अब मैली गंगा में डुबकी लगाने वाले ही मैले हो रहे हैं। अब गंगा में डुबकी लगाने के बाद साफ पानी से नहाना पड़ता है। गंगा में कहीं डूब मरने लायक पानी नहीं बचा, तो पाप धोने के लिए डुबकी कहां मारी जाए। वैसे भी, जब पाप केवल क्लीन चिट मिलने से ही धुल रहे हैं, तो गंगा नहाने का तामझाम क्यों किया जाए।

क्लीन चिट का प्रभाव गंगा के प्रवाह पर भारी है। बिग बी को ही लीजिए, 25 साल में लाख गंगा नहाए, यहां तक कि अपने मेकअप मैन की भोजपुरी फिल्म गंगाऔर फिर गंगा के सीक्वल तक में मुफ्त कामकर मारा, लेकिन बोफोर्स का पाप न धुला, इधर स्टेन लिंडस्ट्रोम ने क्लीन चिट क्या दी, सारे पाप साफ। मैं सौ साल बाद क्लीन चिटों के एक दुर्लभ संग्रहालय की सैर कर रहा हूं। जहां चारों ओर बस क्लीन चिटें ही क्लीन चिटें सजी हुई हैं। नीचे लिखा है- ये क्लीन चिट निर्मल बाबा को मिली थी, ये क्लीन चिट कसाब को मिली थी, ये फलां नेता, ये फलां मंत्री, ये फलां मुख्यमंत्री और ये फलां प्रधानमंत्री को मिली थी। 

क्लीन चिट का भविष्य उज्जवल है। जिस तेजी के साथ क्लीन चिट देने का प्रचलन फैशन में आया है, मुझे लगता है, आने वाले समय में क्लीन चिटों का लेखा-जोखा संभालने के लिए एक पूरा मंत्रालय ही बनाना पड़ेगा। बस पेच यहां फंस सकता है कि क्लीन चिट मंत्रालय के क्लीन चिट मंत्री को क्लीन चिट कौन देगा? अन्ना कहेंगे, जन लोकपाल देगा और सरकार कहेगी, कोई नहीं देगा, क्योंकि वह तो पहले से ही क्लीन चिट मंत्रीहैं।
(आज 11-05-2012 को हिन्दुस्तान में प्रकाशित)




Tuesday, May 1, 2012

बैंक बैलेंस को छोड़िए, किरपा होए महान


     कुत्ते को रोटी खिलाते डरता हूं। कुत्ता रोटी खाकर दुम हिलाने की बजाए कहीं बदले में होने वाली किरपा का हवाला देकर किरपा की रॉयल्टी ना मांग बैठे। ये किरपा के महिमा मुंडन का, द डर्टी पिक्चर के सुपरहिट होने जैसा टाइम चल रहा है। किरपा का खेल क्रिकेट से ज़्यादा लोकप्रिय हो गया है आजकल। पहले टीवी देखने से आंखें खराब होने का डर सताता था लेकिन अब टीवी देखने से भी किरपा आती है। पहले पहल तो मैं समझा की किरपा कोई कन्या है जो मुझे हरी चटनी के साथ समोसा, भल्ला, आलू टिक्की और गोलगप्पे खाता देखकर जीभ लपलपाती हुई चली आएगी। बाद में पता चला कि इस किरपा की जीभ तो कन्या प्रजाति से भी ज्यादा चटपटालोलुप है। कन्या तो केवल जेब खाली कराती है लेकिन ये किरपा तो बैंक बैलेंस ही खाली करा देती है। और बेवफा ऐसी कि फिर भी आ जाए इसकी कोई गारंटी नहीं।

      मुझे पापी को क्या पता था कि किरपा सिर्फ बाबाओं के अकाउंट में नोट डालने से ही आती है। मैं ठहरा मुरख, किरपा का शॉर्टकट बताने वाले बाबाओं को आजतक ढ़ोंगी ही समझता रहा। मैं नादान किरपा के लिए अपने कर्म पर ही अंधविश्वास करता रहा। जैसे आजकल पहुंचे हुए बाबा और स्वामी बनने के लिए सिद्धि और कुंडलीनि जागरण की आवश्यकता नहीं है ठीक वैसे ही किरपा लाने के लिए न आपको कोई प्रयास करना है, न कर्म और कर्तव्य का निर्वाह। बस हाथ पर हाथ रखकर किसी बाबा को फॉलो करना है। अजी फेसबुक पर बाबा का पेज लाइक करने मात्र से किरपा की गारंटी है।

      मैं अज्ञानी इतना तो समझ गया कि किरपा की बौछार में रेन डांस करने के लिए बाबा के बताए ब्रांडेड कपड़े पहनने, हवाईजाहज में घूमने और मंहगा मोबाइल रखने जैसे उपाय जरूरी है, लेकिन किरपा के लिए इन अनूठे उपायों को अमल में लाने के लिए कौन सी बैंक का एटीएम लूटूं या फिर कहां डकैती डालूं ये कौन बताएगा?  अरे, ये उपाय करने लायक ही होता तो किरपा की ज़रूरत क्या थी।

(आज 01-05-2012 को हिन्दुस्तान में प्रकाशित)

Friday, April 27, 2012

किरपा का किस्मत कनेक्शन

बड़ा कंफ्यूज़न है भई, समझ नहीं आ रहा कि किरपा पहले आएगी या किस्मत पहले चमकेगी, किस्मत पहले चमकेगी या फिर किरपा पहलेगी बरसेगी? मामला, पहले अंडा या पहले मुर्गी टाइप्स फंसा हुआ है। मंहगाई-मंहगाई करके गरीब नाहक ही विलाप कर रहा है। विदर्भ के मूर्ख किसानों को समझ लेना चाहिए अब कि किरपा फांसी लगाकर झूल जाने में नहीं बल्कि समोसे और उसकी हरी चटनी में है। भगवान जी थोड़े परपीड़न कामुक निकले, इंसान तो बनाया लेकिन निरा सुख-दुख का पुतला। किन्तु धन्य हैं वो भगवान के अवतार जिनके उपायों से दर्द और परेशानी से कराह रहे इंसान की टेंशन गई पेंशन लेने।
मैं तो कहता हूं भगवान लोगों ने भगवान होने में बेकार की अपना टाइम वेस्ट किया। भगवान लोगों से ज्यादा चौकस खोमचा तो उनके अवतार लोगों ने लगा लिया है। ऊपर भगवान भी हैरान हैं, यार इतने ठाठ तो भगवान होकर मेरे भी कभी नहीं थे जितने मेरे नाम की चिटफंड कंपनी चलाने वालों के हैं। भगवान भगवान ही रह गए और अवतार तारनहार हो लिए। भगवान के मंदिरों के कपाट तो रात-बिरात बंद हो जाते हैं लेकिन अवतार लोगों की दुकान ट्विंटी फोर इनटू सैवन चल रही है। अवतार लोगों के मुनाफे से अब भगवान भी जैलस फील करने लगे हैं और अपने अवतारों पर खुन्नस निकाल रहे हैं। नतीजा ये कि किरपा बरसाने वाले खुद किरपा को तरस रहे हैं। लेकिन भगवान भोले हैं, इतना भी नहीं जानते कि किरपा के झोलाछापों ने तगड़ी सेटिंग कर रखी है। मामला देर-सवेर सैटल हो ही जाएगा। किरपा फिर आने लगेगी। भक्त हैं ना।  
दरअसल इंसानों का ज्यादा पढ़-लिख गया तबका भी बड़ा हठधर्मी है। चमत्कार को नमस्कार करने में अपनी इंसल्ट समझता है और अपने दुख से ज्यादा दुखी वो पड़ोसी पर होने वाली किरपा से है। अरे भाई, अब तो मान ले कि मंदिरों में मत्था पटकने और नाक रगड़ने से किरपा नहीं आती। मंदिरों में भगवान होंगे तो किरपा आएगी ना। भगवान ने तो अपनी शक्तियों की ठेकेदारी अपने अवतारों को दे दी है। मूर्ख मानव, तुझ पर आने वाली किरपा की हर दलाल स्ट्रीट पर एक चमत्कारी बाबा बैठा हुआ है। उस बाबा के समागम में जाकर अपने समस्त गम डाइलियूट कर। यही मायावी बाबा किरपा से तेरा किस्तम कनेक्शन जोड़ेगा। शक्ल और अक्ल पे मत जा, बस मान ले कि बाबा चमत्कारी है। जो ये चमत्कारी ना होता तो तेरी मूर्धन्य मानव प्रजाति का सपरिवार अपने समक्ष मजमा कैसे लगा पाता।
(24-04-2012 को अमर उजाला में प्रकाशित)