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Sunday, May 30, 2010
माफ़ करना बिहारी भाइयों...
देखो भाई लोग, सबसे पहले तो आपको वादा करना होगा कि इस पोस्ट में की गई मज़ाक को Chill Pill की तरह लोगे, सीरियसली कतई नहीं लोगे... और लेना ही है तो लेलो... मेरा काम था वैधानिक चेतावनी जारी करना सो मैंने कर दी, अब मेरी बला से। तो हाज़रीन, वो क्या है ना कि हमलोग यानि न्यूज़ वाले बड़े तनावग्रस्त माहौल में काम करते हैं और उस तनाव को थोड़ा कम करने के लिए कभी कभार हल्का-भारी मज़ाक कर लिया करते हैं।
ऐसा ही उस दिन हुआ। हुआ ये कि ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे के बाद लालू प्रसाद यादव की बाइट आई कि ड्राइवर आंखे मूंद कर ट्रेन चला रहा होगा... लालू का बयान मौक़े को देखते हुए सबको नागवार गुज़रा। मेरे सहकर्मी छतरपाल खिंची ने लालू को भला-बुरा कहा और गुस्से में ही बोले कि 'यार ये लालू रेलमंत्री डिज़र्व ही नहीं करता था' फिर छतर ने पता नहीं किस प्रवाह में सवाल उछाल दिया कि अगर बिहार में ट्रेनें ही नहीं चलतीं तो क्या होता?' छतर के इतना कहते ही हादसे में 65 हो चुके death toll का तनाव हल्का होने लगा।
लोग अपनी-अपनी राय रखने लगे। मेरे सहकर्मी अनुराग श्रीवास्तव बेलौस बोलते हैं.. कोई उनकी बात का बुरा भी नहीं मानता... वो अक्सर अपने बिहारी सहकर्मियों से मज़ाक करते हैं कि ‘अबे…, तुम लोग पैदा होते जन्मपत्री बनवाने की बजाए दिल्ली और मुंबई जाने वाली ट्रेन की टिकट क्यों बनवाते हो..?’
पीसीआर में रायशुमारी की सुनामी आ गई साहब। कोई बोला कि बिहार में ट्रेने नहीं चल रही होतीं तो मुंबई में राज ठाकरे घास काट रहे होते। भाईलोग ट्रेन पकड़-पकड़कर मुंबई पहुंचे और एमएनएस बनवा दी। एक बोला- 'मैंने तो यहां तक सुना है कि बिहार से चलने वाली संपर्क क्रांति दिल्ली आकर वीडियोकोन टॉवर के सामने ही डीरेल हुई थी, तभी से भाई लोग हमारे सहकर्मी हुए।' बाबा जोश ने भी चुटकी ली बोले- 'अरे भाई, वहां से ट्रेन यहां ना आई होती तो नौएडा के सेक्टर-58 की सड़क किनारे लाईन लगा के लिट्टी-चोखे वाले कैसे खड़े हो पाते होते..?' हमारे यहां रोशन कुमार बिहार के आरा से आते हैं, मज़ेदार आदमी हैं। कभी किसी बात का बुरा नहीं मानते। रोशन की हम लोग मज़ाक भी बनाते हैं क्योंकि वो लीव (leave) को ‘लीउ’ बोलते हैं यानि अगर उन्हे मालद्वीव बोलना होगा तो वो ‘मालद्वीउ’ उच्चारण करेंगे।
मैंने भी मज़े लेते हुए कहा, कि भई इतना तो तय है कि तब नौएडा का सेक्टर ग्यारह, सेक्टर ग्यारह ही रहता, ‘ईग्यारह’ ना हो गया होता।
बातें तो और भी बहुत सी हुईं अब यहां क्या-क्या लिखूं। लेकिन एक बात बता दूं कि कुछ लोग चाहते थे कि मैं ये पोस्ट ब्लॉग पर ना डालूं मगर उससे भी कहीं ज़्यादा संख्या ऐसे लोगों की थी जो ये चाहते थे कि मैं इसे पोस्ट ज़रूर करूं। यानि राज ठाकरे मुंबई में ही नहीं, यहां अपनी दिल्ली में भी ख़ूब हैं।
वैसे जहां तक मेरी मंशा का सवाल है मैंने ये क़िस्सा किसी पर हमले के तहत नहीं लिखा है। मेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना कतई नहीं है। उस दिन बिहारी टारगेट हो गए वरना किसी दिन यूपी वाले, एमपी वाले तो किसी दिन दक्षिण भारतीय और तो और किसी दिन असमिया और उड़िया साथी निशाने पर होते हैं। एक वाक़्या बताता हूं आपको। हमारे पीसीआर में साउंड पैनल पर उड़ीसा से पपुना बस्तिया नाम के सहकर्मी हुआ करते थे। एक दिन लाइव शो में दर्शकों की राय फ़ोन के ज़रिए ली जा रही थी, पपुना पैनल प्रोड्यूसर को चिल्लाकर बताते थे कि कहां से किसका फ़ोन है। इसी क्रम में पपुना चिल्लाए- जमसेदपुर से सेक्सी का फोन है। पीसीआर में सन्नाटा पसर गया। ‘किसका फ़ोन है?’ प्रोड्यूसर से हैरत से पूछा। ‘जमसेदपुर से सेक्सी का’, पपुना ने दोहरा दिया। दरअसल वो जमशेदपुर से किसी ‘साक्षी’ का फ़ोन था। उस दिन के बाद इस बात को लेकर पपुना की टांग खिंचाई रोज़ ही होती थी। किसी भी माहौल में ये बात याद आने पर हम लोग आज तक हंसी नहीं रोक पाते। पपुना के और भी मज़ेदार क़िस्से हैं, फिर कभी सुनाउंगा।
यहां समझने वाली बात ये है कि हम लोग ख़बरों के प्रेशर में किसी की बात का बुरा माने बिना किस तरह relaxation तलाश करते हैं। मौक़ा मिलने पर कोई किसी की मज़ाक बनाने से नहीं चूकता, सब ठहाका लगाते हैं और बग़ैर किसी मनमुटाव के टीम वर्क जारी रहता है। ख़बर से मज़ाक हम करते नहीं, एक-दूसरे से तो कर ही सकते हैं। करते भी हैं। कहने वाले कह सकते हैं कि ये कोई पागलपन है या फिर वो ये भी कह सकते हैं कि हम लोग संवेदनहीन हैं, जो किसी दुर्घटना में मारे गए लोगों के बढ़ते death toll की ख़बर के साथ पूरी गंभीरता बरतते हुए भी हंस सकते हैं, तो मैं यही कहूंगा कि कह लीजिए जो कहना है लेकिन इतना तो सोचिए कि जो वीभत्स तस्वीरें हम आपको सिर्फ़ इसलिए नहीं दिखाते कि आप विचलित हो जाएंगे वो तस्वीरें हम ख़ुद घंटों तक देखते हैं। ना जाने कैसी-कैसी फ़ीड इनजस्ट होती हैं। विचलित होते हुए भी हमें विचलित नहीं होना होता। बिलकुल वैसे ही जैसे डॉक्टर किसी शव का पोस्टमार्टम करते हुए भी विचलित नहीं होता।
ऐसे में हंसी-मज़ाक ही तो अगली ख़बर को लेकर पूरी ईमानदारी के साथ जुटने का संबल देती है। चलता हूं एक ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही है...
Friday, May 28, 2010
ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के लोगों को तो मरना ही था...
पश्चिमी मिदनापुर के पास हावडा-कुर्ला ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस माओवादियों के बदले की भावना की भेंट चढ़ गई। तमाम लोग मारे गए। आम आदमी से लेकर प्रधानमंत्री तक सबको बेहद अफसोस हुआ होगा। अफसोस से ज्यादा और हो भी क्या सकता था और विश्वास रखिए अफसोस से ज्यादा कुछ होने वाला भी नहीं है। मुआवज़ा मिलेगा। मुआवज़े से मरनेवाला तो वापस आएगा नहीं। हां, उस पैसे से खरीदकर लाई गई हवन सामग्री से मरने वालों की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ और पूजा पाठ ज़रूर किया जा सकता है। अरे मज़ाक मत समझिए, अब और कर भी क्या सकते हैं भई? धैर्य और संयम रखा है ना आपकी अंटी में, तो निकालिए उसे अंटी से और बिलकुल खैनी के माफ़िक दबा लीजिए मुंह में।
अब मरने वालों का अफ़सोस कौन मनाए। ना प्रधानमंत्री के पास टैम है ना गृहमंत्री के पास और ना हमारे-आपके पास। ऐसे हादसों में हताहतों के लिए आंसू बहाने के लिए तो भईया ओवर टाईम करना पड़ेगा, वरना यहां अपनी सलामती के लिए संघर्ष करने से फुर्सत ही कहां मिल पाती है। नौकरी-पेशे के अलावा पूरा दिन और आधी रात इसी उधेड़बुन में निकल जाती है कि सब्जियां, आटा, दाल और चावल सबसे सस्ते कहां मिल रहे हैं। ईमानदारी की कमाई में महीने के तीसों दिन दो वक्त की दाल-रोटी के वांदे हो रहे हैं और इक्कतीस के महीने में तो एक दिन व्रत रखना पड़ जाता है। ये हाल तो तब है जब घर में दो कमाने वाले हों, एक कमाई वाले घर में तो सोमवार, मंगलवार अथवा बृहस्पतिवार का मासिक व्रत रखे बगैर काम ही नहीं चलता। ऐसे में जब अपनी जान के लाले पड़े हों, दूसरे के दुखः में अफसोस जताना उसे मिलने वाले सरकारी मुआवजे से भी ज्यादा बड़ा योगदान है।
वह तो अच्छा है कि हमने धैर्य और संयम की घुट्टी घोंट कर पी रखी है वरना हम तो बिना किसी हादसे के दहशतगर्दी का मंजर देखकर ही कब के मर जाते। हम जिंदा ही इसलिए हैं क्योंकि हमने धैर्य और संयम का अमृत पी लिया है। हम अजर-अमर हो चुके हैं। हमने अमरत्व प्राप्त कर लिया है। अब हमारा कोई कुछ भी बिगाड़ ले हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम जानते हैं कि जीना और मरना तो उपर वाले के हाथ में है बाबू मौशाय, अरे, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं रे, किसे कब, कैसे और कहां उठना है इसकी डोर तो ऊपरवाले के हाथ में हैं। हा... हा... हा..., जो इस दुनिया में आया है उसे तो एक न एक दिन इस दुनिया से रुखसत होना ही है। फिर इससे अच्छी विदाई भला क्या हो सकती है कि कुछ भोले-भाले निरीह इंसानों को पता ही न चले कि उनकी मौत दहशतगर्दों के गाल पर एक करारा तमाचा बन गई है। दहशतगर्दी के गाल पर जो तमाचा कभी न मार कर सरकार कुसूरवार बन गई वह तमाचा कुछ बेकसूरों ने मार दिया। और वैसे भी ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस ट्रेन के सवारों को आज नहीं तो कल मरना ही था। सबको मरना है। लेकिन वो अपनी मौत मरते तो शायद गुमनाम ही रह जाते, अब कम से कम नक्सलवादियों के गाल पर तमाचा जड़ने वाले मृतकों की सरकारी सूची में अपना नाम तो दर्ज करा गए।
अब देखिए इसमें करना कुछ नहीं है। टेंशन लेने का नई। बस, धैर्य और संयम के साथ काम लेना है। धैर्य और संयम का यह संशोधित अध्याय है। जिसका अंत पूर्ववत पंक्ति से ही होता है कि दहशतगर्दी चाहे देश से बाहर की हो या आंतरिक, अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। धैर्य और संयम के इस संशोधित अध्याय में नक्सलियों की कड़े शब्दों में निंदा करने को इस बार विशेष महत्व दिया गया है। कुल मिलाकर धैर्य और संयम के सब्जेक्ट में सभी का कम से कम स्नातक होना अनिवार्य किए जाने के संबंध में ठोस योजना तैयार किए जाने पर काम चल रहा है। दहशतगर्दों से लड़ने के लिए धैर्य और संयम के स्नातकों की फौज तैयार की जा रही है। आने वाले समय में धैर्य और संयम की थ्योरी और प्रयोगों को भलि-भांति समाझाने के लिए अतिरिक्त कक्षाएं लगाए जाने की भी संभावनाएं हैं। धैर्य और संयम के इस कोर्स को कालांतर में परास्नातक के लिए भी अनिवार्य कर दिया जाएगा। धैर्य और संयम पर गेस्ट लेक्चर के लिए बराक ओबामा और यूसुफ़ रज़ा गिलानी को आमंत्रित भी किया जा सकता है। समय-समय पर धैर्य और संयम पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित करा कर 'वर्तमान संदर्भों में इसकी महत्ता' विषय पर समीक्षा भी कराई जाती रहेगी। सेमिनार की प्रचार सामग्री पर एक विशेष नोट लिखा होगा- समीक्षा में धैर्य और संयम की अलोचना मान्य नहीं होगी, धैर्य और संयम की आलोचना को दहशतगर्दी की मानसिकता से प्रभावित और प्रेरित माना जाएगा।
मुझे धैर्य और संयम के इस पाठ्यक्रम का भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है। क्योंकि आने वाले समय में धैर्य और संयम के हथियार से हमें केवल आतंकवाद और नक्सलवाद को ही मुंह तोड़ जवाब नहीं देना है बल्कि आसमान से चुंबनरत महंगाई का मुकाबला भी करना है। हमें न्याय की खोखली आस में हर अन्याय का सामना धैर्य और संयम के साथ ही करना है। धैर्य और संयम के बेहतर प्रचार-प्रसार के लिए हम गांधीजी के तीन बंदरों की तरह धैर्य और संयम के बंदर भी बना सकते हैं। जिसमें धैर्य का बंदर बिजली के करंट प्रवाहित तारों से चिपका होगा और संयम का बंदर पूरी सहजता के साथ चुपचाप नीचे खड़ा यह तमाशा देख रहा होगा। यहां निजी अनुभव के आधार पर बताना चाहूंगा कि धैर्य और संयम का पाठ कंठस्थ करने के लिए गीता-सार का भी अध्ययन करें और जिन लोगों का धैर्य और संयम जवाब दे रहा है उन्हे भी गीता का सार पढ़ने से विशेष लाभ होगा। फिर देखिएगा धीरे-धीरे धैर्य और संयम कैसे हमारी राष्ट्रीय भावना बन जाएगा। क्या ख़्याल है आपका...?
कुंए के मेंढ़क
एक कुआं था साहब। पानी कम कीचड़ ज्यादा वाला। कुएं में करोड़ों मेंढ़क रहा करते थे। मेंढ़कों को कुएं का सभ्य एवं सम्मानित नागरिक होने पर बड़ा गर्व था। छाती फुलाए-फुलाए इतराकर यहां-वहां गाते फिरते थे, 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का.....इस देश का यारों क्या कहना..टर्रर्रर्रर्रर्रर्र...' इमोश्नल होकर सभी मेंढ़क उस कुएं को 'लोकतंत्र का कुआं' कहते थे। और कुएं से बाहर के सभी जीव-जन्तु उन मेंढ़कों को इमोश्नल फूल। कुएं में हर तबके, हर वर्ग और हर धर्म के मेंढ़क रहते थे। कुछ मेंढ़क जिन्होने अपने सिर पर सफेद टोपी पहन ली वह नेता मेंढ़क कहलाने लगे और उन्होने ने जिन्हे टोपी पहनायी वह कहलाये जनता मेंढ़क। कुएं में लोकतंत्र हो, नेता हो और जनता हो तो यह भला कैसे संभव है कि संसद न हो। तो साहब, कुएं के बीचों-बीच एक संसद भी थी।
तो भईये, कुएं की राजनीति में दो ही पार्टियों की टर्र-टर्र ज्यादा बोलती थी। एक 'कुएं के मेंढ़क पार्टी' और दूसरी 'बरसाती मेंढ़क पार्टी'. कुएं की मेंढ़क पार्टी का चुनाव चिन्ह पैर के पंजे का निशान था। हाथ के पंजे का इसलिए नहीं था क्योंकि वह पहले ही किसी और पार्टी के नाम आवंटित था। पैर का पंजा भी कोई बुरा चुनाव चिन्ह नहीं था। कम से कम पार्टी यह सोच कर तसल्ली में थी कि कीचड़ में पैर खराब करना कीचड़ में हाथ गंदे करने से कहीं ज्यादा बेहतर है। वैसे भी पैर के पंजे से ऐसी-ऐसी खुराफातें की जा सकती हैं जिसकी खबर अपने हाथ तक को न होने पावे। शुभ कामों में सत्यानाश मचाने के लिए पैर का पंजा की अड़ाया जाता है। सो पार्टी बेफ्रिक हो ली।
ऐसे ही, बरसाती मेंढ़क पार्टी का चुनाव चिन्ह था सिंघाड़ा। कमल का फूल इसलिए नहीं क्योंकि वह भी पहले ही किसी और पार्टी के नाम आवंटित था। सिंघाड़ा चुनाव चिन्ह आवंटित होते ही कुएं के मेंढ़क पार्टी को कुएं में पसरी कीचड़ में असीमित संभावनायें नजर आने लगीं। कीचड़ में सिंघाड़े का भविष्य उतना ही उज्जवल था जितना कि कमल का होता है। कुल मिलाकर इन दोनों के अलावा सभी राजनैतिक पार्टियों का प्रमुख एजेंडा 'कीचड़' ही था। नेता मेढ़कों की ओर से विचारधारा, अनुशासन और नैतिकता के नाम पर तब तक पानी किया जाता था जब तक उसकी फिसलन में जनता मेंढ़क फिसल-फिसल कर औंधे मुंह न रपटने लगें। कभी-कभी तो नेता मेंढ़क खुद अपने ही मुंह पर कीचड़ मलते और नाम दूसरी पार्टी का लगाते। राजनीति में कीचड़ और कीचड़ में राजनीति, नेता मेंढ़कों का नया संविधान था।
वैसे, कीचड़ की राजनीति करने वाले मेंढ़कों की हर पार्टी में पौ-बारह रहती है। नेता मेंढ़कों की तोंद जरूरत से ज्यादा बाहर नजर आती है और जनता मेंढ़क राजनीति की प्रयोगशाला में बारी-बारी से पेट चीरने के काम में लाए जाते हैं। अंत में पानी कम कीचड़ ज्यादा वाले इस कुएं के लोकतंत्र में छंटे हुए मेढ़कों की सत्ता अपना स्वर्णिम युग जीती है।
ये 'लोकतंत्र का कुंआ' बडा व्यापकता लिए हुए है जनाब। नज़र घुमाइए, आपको अपने आसपास ही मिल जाएगा। मिला क्या...?
तो भईये, कुएं की राजनीति में दो ही पार्टियों की टर्र-टर्र ज्यादा बोलती थी। एक 'कुएं के मेंढ़क पार्टी' और दूसरी 'बरसाती मेंढ़क पार्टी'. कुएं की मेंढ़क पार्टी का चुनाव चिन्ह पैर के पंजे का निशान था। हाथ के पंजे का इसलिए नहीं था क्योंकि वह पहले ही किसी और पार्टी के नाम आवंटित था। पैर का पंजा भी कोई बुरा चुनाव चिन्ह नहीं था। कम से कम पार्टी यह सोच कर तसल्ली में थी कि कीचड़ में पैर खराब करना कीचड़ में हाथ गंदे करने से कहीं ज्यादा बेहतर है। वैसे भी पैर के पंजे से ऐसी-ऐसी खुराफातें की जा सकती हैं जिसकी खबर अपने हाथ तक को न होने पावे। शुभ कामों में सत्यानाश मचाने के लिए पैर का पंजा की अड़ाया जाता है। सो पार्टी बेफ्रिक हो ली।
ऐसे ही, बरसाती मेंढ़क पार्टी का चुनाव चिन्ह था सिंघाड़ा। कमल का फूल इसलिए नहीं क्योंकि वह भी पहले ही किसी और पार्टी के नाम आवंटित था। सिंघाड़ा चुनाव चिन्ह आवंटित होते ही कुएं के मेंढ़क पार्टी को कुएं में पसरी कीचड़ में असीमित संभावनायें नजर आने लगीं। कीचड़ में सिंघाड़े का भविष्य उतना ही उज्जवल था जितना कि कमल का होता है। कुल मिलाकर इन दोनों के अलावा सभी राजनैतिक पार्टियों का प्रमुख एजेंडा 'कीचड़' ही था। नेता मेढ़कों की ओर से विचारधारा, अनुशासन और नैतिकता के नाम पर तब तक पानी किया जाता था जब तक उसकी फिसलन में जनता मेंढ़क फिसल-फिसल कर औंधे मुंह न रपटने लगें। कभी-कभी तो नेता मेंढ़क खुद अपने ही मुंह पर कीचड़ मलते और नाम दूसरी पार्टी का लगाते। राजनीति में कीचड़ और कीचड़ में राजनीति, नेता मेंढ़कों का नया संविधान था।
वैसे, कीचड़ की राजनीति करने वाले मेंढ़कों की हर पार्टी में पौ-बारह रहती है। नेता मेंढ़कों की तोंद जरूरत से ज्यादा बाहर नजर आती है और जनता मेंढ़क राजनीति की प्रयोगशाला में बारी-बारी से पेट चीरने के काम में लाए जाते हैं। अंत में पानी कम कीचड़ ज्यादा वाले इस कुएं के लोकतंत्र में छंटे हुए मेढ़कों की सत्ता अपना स्वर्णिम युग जीती है।
ये 'लोकतंत्र का कुंआ' बडा व्यापकता लिए हुए है जनाब। नज़र घुमाइए, आपको अपने आसपास ही मिल जाएगा। मिला क्या...?
Thursday, May 27, 2010
मैं ‘मुस्कान’ कैसे हुआ..
लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि भईए, ये ‘मुस्कान’ क्या है? आज बता ही देता हूं।
द्वारिका प्रसाद माहेश्रवरी जी का नाम तो सुना ही होगा आपने। उनकी कविताएं ‘उठो लाल अब आंखे खोलो, भोर भई अब मुख को धो लो...’और 'वीर तुम बढ़े चलो..', शायद ही किसी ने अपने छुटपन में ना पढ़ी हो। ये नाम ‘मुस्कान’ मुझे उन्ही द्वरिका प्रसाद माहेश्रवरी जी ने दिया है। किस्मत से मैं भी दादा के शहर आगरा में रहता था। उन दिनों कविता लिखने का शौक परवान चढ़ रहा था, कवि मित्रों के साथ ख़ूब गोष्ठियां भी हुआ करती थीं। अहो भाग्य, जो इसी क्रम में दो तीन बार दादा की अध्यक्षता में हुए कवि सम्मेलन में मुझे भी कविता पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। ये कोई 1992-93 की बात है। तब मैं अनुराग सक्सेना के नाम से ही मंचों पर काव्यपाठ किया करता था और अख़बारों में भी इसी नाम से मेरे लेख और कविताएं प्रकाशित होते थे। दादा के साथ कविता पाठ करना गौरव की बात थी। एक दिन दादा के बगल में ही बैठ गया। तभी संचालक ने एक कवि को उनके तख़ल्लुस यानि उपनाम के साथ आमंत्रित किया। कवि महोदय का उपनाम अत्यंत हास्यास्पद था, सो सब हंस पढ़े। दादा भी हंस दिए। मैंने माहेश्रवरी जी से पूछा कि दादा आपने कोई उपनाम क्यों नहीं रखा? वो बोले- ‘अमां यार, हमारे दौर में कुल जमा 7-8 कवि हुआ करते थे, अब आजकल तो श्रोताओं से ज़्यादा कवि हुआ करते हैं। हमें पहचान के लिए किसी उटपटांग नाम की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब तो ऐसे ही नामों से कवियों कि पहचान होती है। कोई अपने नाम के साथ गिलहरी जोड़े हुए है, कोई सूंड़, पटाखा, भोंपू, सांड और भी ना जाने क्या-क्या। तुम भी कुछ लगाते हो क्या?’
‘नहीं दादा लगाता तो नहीं हूं लेकिन सोच रहा हूं लगा लूं.... दोस्त लोग कहते हैं कि बड़ी चुभने वाली कविताएं कहता हूं, तो ‘कांटा’ या ‘सुई’ या फिर इन जैसा कोई तख़ल्लुस रख लो लेकिन मुझे ये सब पसंद नहीं...’ थोड़ा पॉज़ लेकर मैंने कहा ‘दादा आप कि कोई नाम सुझा दीजिए ना।’ वो बोले- ‘अच्छा एक दिन को अपनी डायरी दो... कल घर आकर ले जाना... पढ़कर बताता हूं क्या उपनाम हो सकता है।’
अगले दिन मैं दादा के घर डायरी लेने पहुंचा। डायरी देते हुए दादा बोले-‘यार, बहुत रोता है तू (कविताओं में) कम से कम नाम ही ‘मुस्कान’ रख ले।’ और मैं मुस्कान हो गया। फिर काफ़ी समय तक अनुराग सक्सेना ‘मुस्कान’ के नाम से लिखता रहा लेकिन फिर दोस्तों की सलाह पर सिर्फ ‘अनुराग मुस्कान’ कर लिया।
बालकवि द्वारिका प्रसाद माहेश्रवरी ओजस्वी कवि थे। ये उन्ही को ओज है कि मैं आज रोतड़ू से मुस्कान हो गया हूं।
द्वारिका प्रसाद माहेश्रवरी जी का नाम तो सुना ही होगा आपने। उनकी कविताएं ‘उठो लाल अब आंखे खोलो, भोर भई अब मुख को धो लो...’और 'वीर तुम बढ़े चलो..', शायद ही किसी ने अपने छुटपन में ना पढ़ी हो। ये नाम ‘मुस्कान’ मुझे उन्ही द्वरिका प्रसाद माहेश्रवरी जी ने दिया है। किस्मत से मैं भी दादा के शहर आगरा में रहता था। उन दिनों कविता लिखने का शौक परवान चढ़ रहा था, कवि मित्रों के साथ ख़ूब गोष्ठियां भी हुआ करती थीं। अहो भाग्य, जो इसी क्रम में दो तीन बार दादा की अध्यक्षता में हुए कवि सम्मेलन में मुझे भी कविता पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। ये कोई 1992-93 की बात है। तब मैं अनुराग सक्सेना के नाम से ही मंचों पर काव्यपाठ किया करता था और अख़बारों में भी इसी नाम से मेरे लेख और कविताएं प्रकाशित होते थे। दादा के साथ कविता पाठ करना गौरव की बात थी। एक दिन दादा के बगल में ही बैठ गया। तभी संचालक ने एक कवि को उनके तख़ल्लुस यानि उपनाम के साथ आमंत्रित किया। कवि महोदय का उपनाम अत्यंत हास्यास्पद था, सो सब हंस पढ़े। दादा भी हंस दिए। मैंने माहेश्रवरी जी से पूछा कि दादा आपने कोई उपनाम क्यों नहीं रखा? वो बोले- ‘अमां यार, हमारे दौर में कुल जमा 7-8 कवि हुआ करते थे, अब आजकल तो श्रोताओं से ज़्यादा कवि हुआ करते हैं। हमें पहचान के लिए किसी उटपटांग नाम की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब तो ऐसे ही नामों से कवियों कि पहचान होती है। कोई अपने नाम के साथ गिलहरी जोड़े हुए है, कोई सूंड़, पटाखा, भोंपू, सांड और भी ना जाने क्या-क्या। तुम भी कुछ लगाते हो क्या?’
‘नहीं दादा लगाता तो नहीं हूं लेकिन सोच रहा हूं लगा लूं.... दोस्त लोग कहते हैं कि बड़ी चुभने वाली कविताएं कहता हूं, तो ‘कांटा’ या ‘सुई’ या फिर इन जैसा कोई तख़ल्लुस रख लो लेकिन मुझे ये सब पसंद नहीं...’ थोड़ा पॉज़ लेकर मैंने कहा ‘दादा आप कि कोई नाम सुझा दीजिए ना।’ वो बोले- ‘अच्छा एक दिन को अपनी डायरी दो... कल घर आकर ले जाना... पढ़कर बताता हूं क्या उपनाम हो सकता है।’
अगले दिन मैं दादा के घर डायरी लेने पहुंचा। डायरी देते हुए दादा बोले-‘यार, बहुत रोता है तू (कविताओं में) कम से कम नाम ही ‘मुस्कान’ रख ले।’ और मैं मुस्कान हो गया। फिर काफ़ी समय तक अनुराग सक्सेना ‘मुस्कान’ के नाम से लिखता रहा लेकिन फिर दोस्तों की सलाह पर सिर्फ ‘अनुराग मुस्कान’ कर लिया।
बालकवि द्वारिका प्रसाद माहेश्रवरी ओजस्वी कवि थे। ये उन्ही को ओज है कि मैं आज रोतड़ू से मुस्कान हो गया हूं।
Wednesday, May 26, 2010
भगवान के नाम पे...
नौ साल का करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में।
भाई साहब, बालाजी मंदिर वालों ने 1070 किलो सोना बैंक में जमा कराया है पिछले दिनों। भक्तों ने चढ़ावे में चढ़ाया था सोना। मैं तो ख़बर सुनकर ही मालामाल हो गया। यही तो कलयुग है। इधर भक्तों का इन्क्रीमेंट तक अटका हुआ है, और उधर भगवान बिलियनेयर होते जा रहे हैं। बालाजी तो खैर सबसे अमीर भगवान हैं ही लेकिन बाक़ी के भगवान लोग भी कम मज़े में नहीं हैं। ये कैसी विडंबना है प्रभु, भक्त भरोसे भगवान मालामाल और भगवान भरोसे भक्त कंगाल। हे भगवान, ये क्या हो रिया है?
भगवान तो भगवान, भगवान का गुणगान करने वालों की भी कम ऐश नहीं है। आपने कभी जिस महाराज का नाम तक नहीं सुना वो भी कथा बांचने के लिए एक साथ हज़ारों भक्तों को क्रूज़ पर ले जाते हैं। लंदन, पेरिस और न्यूयार्क की हवाई यात्राएं कराते हैं। कोई क्रूज़ पर कथा बांच रहा है तो कोई 50,000 हज़ार फीट की उचांई पर भजन कीर्तन कर रहा है। नारायण...नारायण। जो कभी किसी चैनल पर प्रवचन करते थे उन्होने वो चैनल ही खरीद मारे। जो कभी भगवान के वंदन के साथ इस फील्ड में उतरे थे, वो ख़ुद ही भगवान बन बैठे। परमपूज्यपाद हो गए, प्रातःस्मरणीय कहलाने लगे।
नौ साल पहले एक भारी भूल ना की होती तो मैं भी आज एक जाना माना घुटा संत होता। अरे कुछ नहीं..., आस्था चैनल के लिए एक कथावाचक महाराज के प्रवचनों की डील कराई थी। नौ लाख़ की डील थी, जिसमें मेरा कमीशन 90,000/- था। कोई लिखित कांट्रेक्ट हुआ नहीं था, पूरी डील वायदा कारोबार के तहत हुई थी। खा गया गच्चा। फंस गया कमीशन। आज नहीं कल, कल नहीं महीने भर बाद, महीने नहीं साल भर... हार कर मैं पहुंच गया मुंबई। मालिक से मिलने। पैसे मांगे तो बोले-‘अरे 90,000 रुपए लेकर क्या करेंगे अनुराग जी, आप तो करोड़ों के आदमी हैं। क्या दमदार आवाज़ है आपकी। चलिए हम आपको आस्था पर स्लॉट देते हैं और तीन महीने का समय... कराना आपको ये है कि रामायण और महाभारत को अंग्रेज़ी में नाट्य पटकथा के रूप में कंठस्थ कर लीजिए। तीन महीने बाद चैनल पर आपके प्रवचन प्रारंभ। पैसा हमारा.. दमदार आवाज़ में प्रस्तुति आपकी। साल भर में ही करोड़पति हो जाएंगे आप। महाराज होने का तमगा अलग।’
लोग आंखों में सपने सजाकर मुंबई जाते है और मैं मुंबई से आखों में सपने सजाकर लौट रहा था। प्रस्ताव के बारे में पता चलते ही घर में रोआ-चिल्लाट मच गई। मां छाती पीट-पीट कर रोने लगी-‘अरे, क्या इसी दिन के लिए पैदा किया था तुझे कि एक दिन बाबा बन जाए। नहीं बेटा नहीं... बस ये मत करना... तुझे मेरी क़सम।’ पिता के देहांत के बाद मां ने मुझे बड़ी मुश्किलों से पाला है। सो मैं उसके रुदन पर पसीज गया। बाबाजी बनने का आइडिया मां के आंसूओं में डाइलियूट हो गया।
आज बड़ा अफ़सोस होता है भाई। नौ साल का टनाटन करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में। मस्त लाइफ़ कट रही होती। और हां, धन-दौलत, ऐश-ओ-आराम और वैभव देखकर शायद मां को भी कोई शिकायत नहीं होती। वो नौ साल पहले भी मेरी मां थी और आज भी मेरी मां है। आस्था का प्रपोज़ल मान लिया होता तो वो भी सिर्फ मां ना रहती। अरे भाई गुरूमां हो गई होती। क्या ख़्याल है आपका...?
और हां, एक स्वर्णिम करियर से तो मुझे हाथ धोना ही पड़ा, वो 90,000 रुपए भी गए सो अलग।
भाई साहब, बालाजी मंदिर वालों ने 1070 किलो सोना बैंक में जमा कराया है पिछले दिनों। भक्तों ने चढ़ावे में चढ़ाया था सोना। मैं तो ख़बर सुनकर ही मालामाल हो गया। यही तो कलयुग है। इधर भक्तों का इन्क्रीमेंट तक अटका हुआ है, और उधर भगवान बिलियनेयर होते जा रहे हैं। बालाजी तो खैर सबसे अमीर भगवान हैं ही लेकिन बाक़ी के भगवान लोग भी कम मज़े में नहीं हैं। ये कैसी विडंबना है प्रभु, भक्त भरोसे भगवान मालामाल और भगवान भरोसे भक्त कंगाल। हे भगवान, ये क्या हो रिया है?
भगवान तो भगवान, भगवान का गुणगान करने वालों की भी कम ऐश नहीं है। आपने कभी जिस महाराज का नाम तक नहीं सुना वो भी कथा बांचने के लिए एक साथ हज़ारों भक्तों को क्रूज़ पर ले जाते हैं। लंदन, पेरिस और न्यूयार्क की हवाई यात्राएं कराते हैं। कोई क्रूज़ पर कथा बांच रहा है तो कोई 50,000 हज़ार फीट की उचांई पर भजन कीर्तन कर रहा है। नारायण...नारायण। जो कभी किसी चैनल पर प्रवचन करते थे उन्होने वो चैनल ही खरीद मारे। जो कभी भगवान के वंदन के साथ इस फील्ड में उतरे थे, वो ख़ुद ही भगवान बन बैठे। परमपूज्यपाद हो गए, प्रातःस्मरणीय कहलाने लगे।
नौ साल पहले एक भारी भूल ना की होती तो मैं भी आज एक जाना माना घुटा संत होता। अरे कुछ नहीं..., आस्था चैनल के लिए एक कथावाचक महाराज के प्रवचनों की डील कराई थी। नौ लाख़ की डील थी, जिसमें मेरा कमीशन 90,000/- था। कोई लिखित कांट्रेक्ट हुआ नहीं था, पूरी डील वायदा कारोबार के तहत हुई थी। खा गया गच्चा। फंस गया कमीशन। आज नहीं कल, कल नहीं महीने भर बाद, महीने नहीं साल भर... हार कर मैं पहुंच गया मुंबई। मालिक से मिलने। पैसे मांगे तो बोले-‘अरे 90,000 रुपए लेकर क्या करेंगे अनुराग जी, आप तो करोड़ों के आदमी हैं। क्या दमदार आवाज़ है आपकी। चलिए हम आपको आस्था पर स्लॉट देते हैं और तीन महीने का समय... कराना आपको ये है कि रामायण और महाभारत को अंग्रेज़ी में नाट्य पटकथा के रूप में कंठस्थ कर लीजिए। तीन महीने बाद चैनल पर आपके प्रवचन प्रारंभ। पैसा हमारा.. दमदार आवाज़ में प्रस्तुति आपकी। साल भर में ही करोड़पति हो जाएंगे आप। महाराज होने का तमगा अलग।’
लोग आंखों में सपने सजाकर मुंबई जाते है और मैं मुंबई से आखों में सपने सजाकर लौट रहा था। प्रस्ताव के बारे में पता चलते ही घर में रोआ-चिल्लाट मच गई। मां छाती पीट-पीट कर रोने लगी-‘अरे, क्या इसी दिन के लिए पैदा किया था तुझे कि एक दिन बाबा बन जाए। नहीं बेटा नहीं... बस ये मत करना... तुझे मेरी क़सम।’ पिता के देहांत के बाद मां ने मुझे बड़ी मुश्किलों से पाला है। सो मैं उसके रुदन पर पसीज गया। बाबाजी बनने का आइडिया मां के आंसूओं में डाइलियूट हो गया।
आज बड़ा अफ़सोस होता है भाई। नौ साल का टनाटन करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में। मस्त लाइफ़ कट रही होती। और हां, धन-दौलत, ऐश-ओ-आराम और वैभव देखकर शायद मां को भी कोई शिकायत नहीं होती। वो नौ साल पहले भी मेरी मां थी और आज भी मेरी मां है। आस्था का प्रपोज़ल मान लिया होता तो वो भी सिर्फ मां ना रहती। अरे भाई गुरूमां हो गई होती। क्या ख़्याल है आपका...?
और हां, एक स्वर्णिम करियर से तो मुझे हाथ धोना ही पड़ा, वो 90,000 रुपए भी गए सो अलग।
Tuesday, May 25, 2010
रूचिका आज कहीं 19 साल की होगी...
न्याय हमारी पहुंच से कितनी उम्र दूर है...?
रूचिका आज अगर इस दुनिया में होती तो 32 साल के आसपास होती और अगर आप आत्मा के शरीर बदलने में यक़ीन करते हैं तो आपको ये भी मानना पड़ेगा की रुचिका ने अगर दूसरा जन्म लिया होगा तो वो आज किसी रूप में 19 साल की हो चुकी होगी। रुचिका ने जब आत्महत्या की थी तो वो 13 साल की थी। यानि रुचिका आज उस उम्र से भी 6 साल बड़ी होगी जिस उम्र में उसे राठौर ने ख़ुदकुशी के लिए मजबूर किया था। मैंने आपको इतना mathematics इसलिए समझाया कि आप समझ सकें कि जिस देश में आप रहते हैं उसमें न्याय आपकी पहुंच से कितनी उम्र दूर है।
कल्पना कीजिए कि कहीं जन्म ले चुकी 19 साल की रूचिका आज अपने घर में बैठकर टीवी पर ये ख़बर देख रही होगी और रूचिका गिरहोत्रा के लिए इंसाफ़ की उम्मीद में प्रार्थना कर रही होगी और घर से बाहर..... घर से बाहर ना जाने कितने ही एसपीएस राठौर उसे दबोचने के लिए तैयार होंगे। तो क्या ये दमनचक्र जारी रहेगा। एक राठौर पकड़ा गया, कितने छूट जाते होंगे।
वैसे कमाल नहीं है इस देश की क़ानून व्यवस्था? उन्नीस साल बाद रुचिका से छेड़खानी के मामले में मनचले राठौर को सज़ा होती है, और वो भी ड़ेढ साल की। ये भी अभी निचली अदालत का फैसला है। यानि पीड़ित परिवार के लिए 19 साल बाद भी ये लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है। अभी तो खैर राठौर का ठौर जेल है लेकिन कितने दिन? राठौर के सामने हाई कोर्ट का दरवाज़ा है, सुप्रीम कोर्ट की चौखट है। मलतब ये कि राठौर सालों तक इन अदालतों के दरवाज़े पीट-पीट कर कड़ी सज़ा से ज़्यादा से ज़्यादा समय तक बचता फिर सकता है। मुमकिन है, इन सालों में राठौर अपनी स्वाभाविक मौत मर भी जाए। लेकिन याद रहे, रुचिका अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरी थी। उसे राठौर ने मरने पर मजबूर किया था। एक 13 साल की मासूम बच्ची को किस क़दर प्रताड़ित किया होगा इस वहशी ने।
फिर भी हमारे देश की क़ानून व्यवस्था ने उसे छेड़खानी के मामले में अधिकतम सज़ा, जो दो साल की होती है, वो नहीं दी। कारण समझा जा रहा है राठौर की बढ़ती उम्र और उसकी बीमारियां। तो क्या रूचिका की उस उम्र को नज़रअंदाज़ कर दिया गया? क्या जिस उम्र में रुचिका ने वो मानसिक उत्पीड़न सहा होगा उसके सामने दो साल की सज़ा काफी है? और राठौर को तो वो भी नहीं हुई। जब राठौर को छः महीने की सज़ा हुई थी तो वो फ़िल्म 'कमीने' के फ़ाहिद कपूर की तरह मुस्कुरा रहा था। आज डेढ़ साल की सज़ा हुई तो सिट्टीपिट्टी गुम। लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है। उसकी पत्नी तो महंगे ब्रांड का चश्मा पहने कर मुस्कुरा ही रही है। और सबसे बड़ी बात तो ये कि रूचिका को न्याय केवल राठौर के चेहरे से मुस्कुराहट भर छीन लेने से तो मिलेगा नहीं।
आज इसी मसले पर Live Bulletin कर रहा था। केन्द्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ से Phono हुआ तो उन्होंने भी कहा कि किसी से छेड़खानी की सज़ा दो साल बहुत कम है, और विशेषकर बच्चियों के साथ हुई छेड़खानी के मामले में तो बहुत कम। उन्होने न्याय व्यवस्था में बदलाव की पैरवी भी की। मेरी समझ में ये नहीं आता कि जब लचर न्याय एवं क़ानून व्यवस्था में बदलाव की ज़रूरत इतनी शिद्दत के साथ महसूस की जाती रही है तो इंतज़ार किस बात का है?
या तो आलसी व्यवस्था बदले या फिर 19, 20, और 25 साल बाद निचली अदालतों से मिले न्यायसंगत फैसलों का स्वागत करने की हमारी आदत।
रूचिका आज अगर इस दुनिया में होती तो 32 साल के आसपास होती और अगर आप आत्मा के शरीर बदलने में यक़ीन करते हैं तो आपको ये भी मानना पड़ेगा की रुचिका ने अगर दूसरा जन्म लिया होगा तो वो आज किसी रूप में 19 साल की हो चुकी होगी। रुचिका ने जब आत्महत्या की थी तो वो 13 साल की थी। यानि रुचिका आज उस उम्र से भी 6 साल बड़ी होगी जिस उम्र में उसे राठौर ने ख़ुदकुशी के लिए मजबूर किया था। मैंने आपको इतना mathematics इसलिए समझाया कि आप समझ सकें कि जिस देश में आप रहते हैं उसमें न्याय आपकी पहुंच से कितनी उम्र दूर है।
कल्पना कीजिए कि कहीं जन्म ले चुकी 19 साल की रूचिका आज अपने घर में बैठकर टीवी पर ये ख़बर देख रही होगी और रूचिका गिरहोत्रा के लिए इंसाफ़ की उम्मीद में प्रार्थना कर रही होगी और घर से बाहर..... घर से बाहर ना जाने कितने ही एसपीएस राठौर उसे दबोचने के लिए तैयार होंगे। तो क्या ये दमनचक्र जारी रहेगा। एक राठौर पकड़ा गया, कितने छूट जाते होंगे।
वैसे कमाल नहीं है इस देश की क़ानून व्यवस्था? उन्नीस साल बाद रुचिका से छेड़खानी के मामले में मनचले राठौर को सज़ा होती है, और वो भी ड़ेढ साल की। ये भी अभी निचली अदालत का फैसला है। यानि पीड़ित परिवार के लिए 19 साल बाद भी ये लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है। अभी तो खैर राठौर का ठौर जेल है लेकिन कितने दिन? राठौर के सामने हाई कोर्ट का दरवाज़ा है, सुप्रीम कोर्ट की चौखट है। मलतब ये कि राठौर सालों तक इन अदालतों के दरवाज़े पीट-पीट कर कड़ी सज़ा से ज़्यादा से ज़्यादा समय तक बचता फिर सकता है। मुमकिन है, इन सालों में राठौर अपनी स्वाभाविक मौत मर भी जाए। लेकिन याद रहे, रुचिका अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरी थी। उसे राठौर ने मरने पर मजबूर किया था। एक 13 साल की मासूम बच्ची को किस क़दर प्रताड़ित किया होगा इस वहशी ने।
फिर भी हमारे देश की क़ानून व्यवस्था ने उसे छेड़खानी के मामले में अधिकतम सज़ा, जो दो साल की होती है, वो नहीं दी। कारण समझा जा रहा है राठौर की बढ़ती उम्र और उसकी बीमारियां। तो क्या रूचिका की उस उम्र को नज़रअंदाज़ कर दिया गया? क्या जिस उम्र में रुचिका ने वो मानसिक उत्पीड़न सहा होगा उसके सामने दो साल की सज़ा काफी है? और राठौर को तो वो भी नहीं हुई। जब राठौर को छः महीने की सज़ा हुई थी तो वो फ़िल्म 'कमीने' के फ़ाहिद कपूर की तरह मुस्कुरा रहा था। आज डेढ़ साल की सज़ा हुई तो सिट्टीपिट्टी गुम। लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है। उसकी पत्नी तो महंगे ब्रांड का चश्मा पहने कर मुस्कुरा ही रही है। और सबसे बड़ी बात तो ये कि रूचिका को न्याय केवल राठौर के चेहरे से मुस्कुराहट भर छीन लेने से तो मिलेगा नहीं।
आज इसी मसले पर Live Bulletin कर रहा था। केन्द्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ से Phono हुआ तो उन्होंने भी कहा कि किसी से छेड़खानी की सज़ा दो साल बहुत कम है, और विशेषकर बच्चियों के साथ हुई छेड़खानी के मामले में तो बहुत कम। उन्होने न्याय व्यवस्था में बदलाव की पैरवी भी की। मेरी समझ में ये नहीं आता कि जब लचर न्याय एवं क़ानून व्यवस्था में बदलाव की ज़रूरत इतनी शिद्दत के साथ महसूस की जाती रही है तो इंतज़ार किस बात का है?
या तो आलसी व्यवस्था बदले या फिर 19, 20, और 25 साल बाद निचली अदालतों से मिले न्यायसंगत फैसलों का स्वागत करने की हमारी आदत।
Monday, May 24, 2010
'जब पप्पू के बापू श्यामलाल से मिले भगवान शंकर'
'जब पप्पू के बापू श्यामलाल से मिले भगवान शंकर'
एक सूखा ग्रस्त गांव था। ये उस गांव के दो बेचारे किसानों की कहानी है, रामलाल और श्यामलाल। दोनों अभागे सूखे की मार से त्रस्त थे। तीन सालों से आसमान एक बूंद नहीं टपका था। जी हां, बिलकुल फ़िल्म लगान के चंपारन गांव की सी कहानी थी। कहीं से उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आ रही थी। खेत और पेट दोनों सूख चुके थे। अब तो बस भगवान का ही आसरा था। लेकिन एक समस्या थी, रामलाल जहां घोर आस्तिक किस्म था वहीं पट्ठा श्यामलाल विकट नास्तिक। रामलाल का भरोसा धर्म पर तो श्यामलाल भाग्य भरोसे।
तो आगे हुआ ये कि भईए, किसान रामलाल ने तो अपने खेत में शिव जी का एक मंदिर बनाया और पिल पड़ा पूजा पाठ में। उधर श्यामलाल की महरारू यानि घरवाली ये जानती थी कि पप्पू के बापू यानि श्यामलाल पूजापाठ तो करेंगे नहीं, फिर भी अभागी ने शंकर जी की एक छोटी सी मूर्ति तो लगा ही खेत के बीचों बीच। और ख़ुद घर में पूजा अर्चना शुरू कर दी। अब रोज़ होता ये था कि रामलाल तो बर्ह्म महूर्त से रात्रिकाल के अंतिम पहर तक शिव चालीसा का पाठ करते नहीं थकता और उधर श्यामलाल बर्ह्म महूर्त से रात्रिकाल के अंतिम पहर तक सूखे खेत में गड़े शिवशंकर की मूर्ति को गालियां बकता। वो बिना बात अक्सर भड़क उठता, शिव शंकर को भद्दी गालियां देता, एक बार मिल लेने पर देख लेने की धमकियां देता। थूकता, लतियाता और शिव जी में कीड़े पड़ने की बददुआ देता। मूर्ति हटाने की हिम्मत तो थी नहीं श्यामलाल की, घरआली ने जो लगाई थी। खैर साहब, दो साल तक ऐसा ही चलता रहा.... बस, ऐसा ही चलता रहा। एक खेत में पूजापाठ और दूजे में गाली-गलौज।
अब बारी ऊपर पार्वती के साथ बर्फ़ीले कैलाश पर्वत पर विराजे शिव शंकर की थी। पार्वती से बोले- ‘सुनो प्रिये, हम ज़रा अभी आते हैं। एक भक्त बड़ी श्रद्धा से हमारी वंदना करता है, उसे वरदान देकर आते हैं।’ शिव शंकर प्रकट हो गए श्यामलाल के सामने। वही श्यामलाल जो शिव शंकर को खरी-खोटी सुनाता था। बोले- ‘हम प्रसन्न हुए बच्चा, मांग क्या मांगता है?’ श्यामलाल भिन्नौट हो गया, भड़क उठा। चिल्लाया- ‘भाग जा शिवशंकर के बच्चे, वरना खैर नहीं तेरी... साल्ले इसी हल से ज़मीन में गाड़ दूंगा... मेरी दिल से निकली बददुआ लगेगी तुझे, देखना कीड़े पड़ेगें तुझमें... तमाशा देखने आया है हमारा... हमें कुछ नहीं चाहिए... जा भाग जा यहां से।’ शिवजी मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए ‘तथास्तु’ कह कर कट लिए। उनके अंतर्ध्यान होते ही श्यामलाल के खेत से सोने की अशर्फियां निकलने लगीं। श्यामलाल के दिन बहुर गए।
शिवजी कैलाश वापस लौटे तो पार्वती जी माथा पकड़े बैठी थीं। बोलीं- ‘धत्त तेरे की, ई धतूरे की पिनक में ये क्या कर आए प्रभु, ग़लत आदमी को वरदान दे दिया, मेरा तो कब से माथा ख़राब है... रामलाल और श्यामलाल में टोटल कंफ्यूज़ कर गए आप... जो गाली बकता था उसकी लाइफ़ सेट कर दीस।’ शिवशंकर मुस्कुराए, बोले- ‘नहीं प्रिया, हम कतई कंफ्यूज़ नहीं हैं... हमने सही आदमी को वरदान दिया है... रामलाल हमारा नाम लालच और स्वार्थ के चलते लेता है, लेकिन श्यामलाल निस्वार्थ भाव से हमारा नाम लेता है... गालियों के साथ ही सही लेकिन पूरे मन, कर्म और वचन के साथ हमरा नाम लेता है। हमारा सच्चा भक्त तो श्यामलाल ठहरा। इसलिए हम उससे प्रसन्न हुए। समझी....?’
‘आप तो एकदम से ग्रेट हैं जी।’, पार्वती जी इतराते हुए बोलीं।
मॉरल ऑफ़ द स्टोरी- जो तुम्हे बेनागा गालियां बकता है... वो तुम्हारा दुश्मन नहीं बल्कि वो तो तुम्हारा सच्चा भक्त है। उसे गाली के बदले गाली नहीं, वरदान दो वरदान। अमां अब तो अपने सच्चे भक्तों के पहचानना सीखो। मैं भी आजकल अपने सच्चे भक्तों को चिन्हित कर रहा हूं। मित्रों.... उन्हे वरदान जो देना है।
एक सूखा ग्रस्त गांव था। ये उस गांव के दो बेचारे किसानों की कहानी है, रामलाल और श्यामलाल। दोनों अभागे सूखे की मार से त्रस्त थे। तीन सालों से आसमान एक बूंद नहीं टपका था। जी हां, बिलकुल फ़िल्म लगान के चंपारन गांव की सी कहानी थी। कहीं से उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आ रही थी। खेत और पेट दोनों सूख चुके थे। अब तो बस भगवान का ही आसरा था। लेकिन एक समस्या थी, रामलाल जहां घोर आस्तिक किस्म था वहीं पट्ठा श्यामलाल विकट नास्तिक। रामलाल का भरोसा धर्म पर तो श्यामलाल भाग्य भरोसे।
तो आगे हुआ ये कि भईए, किसान रामलाल ने तो अपने खेत में शिव जी का एक मंदिर बनाया और पिल पड़ा पूजा पाठ में। उधर श्यामलाल की महरारू यानि घरवाली ये जानती थी कि पप्पू के बापू यानि श्यामलाल पूजापाठ तो करेंगे नहीं, फिर भी अभागी ने शंकर जी की एक छोटी सी मूर्ति तो लगा ही खेत के बीचों बीच। और ख़ुद घर में पूजा अर्चना शुरू कर दी। अब रोज़ होता ये था कि रामलाल तो बर्ह्म महूर्त से रात्रिकाल के अंतिम पहर तक शिव चालीसा का पाठ करते नहीं थकता और उधर श्यामलाल बर्ह्म महूर्त से रात्रिकाल के अंतिम पहर तक सूखे खेत में गड़े शिवशंकर की मूर्ति को गालियां बकता। वो बिना बात अक्सर भड़क उठता, शिव शंकर को भद्दी गालियां देता, एक बार मिल लेने पर देख लेने की धमकियां देता। थूकता, लतियाता और शिव जी में कीड़े पड़ने की बददुआ देता। मूर्ति हटाने की हिम्मत तो थी नहीं श्यामलाल की, घरआली ने जो लगाई थी। खैर साहब, दो साल तक ऐसा ही चलता रहा.... बस, ऐसा ही चलता रहा। एक खेत में पूजापाठ और दूजे में गाली-गलौज।
अब बारी ऊपर पार्वती के साथ बर्फ़ीले कैलाश पर्वत पर विराजे शिव शंकर की थी। पार्वती से बोले- ‘सुनो प्रिये, हम ज़रा अभी आते हैं। एक भक्त बड़ी श्रद्धा से हमारी वंदना करता है, उसे वरदान देकर आते हैं।’ शिव शंकर प्रकट हो गए श्यामलाल के सामने। वही श्यामलाल जो शिव शंकर को खरी-खोटी सुनाता था। बोले- ‘हम प्रसन्न हुए बच्चा, मांग क्या मांगता है?’ श्यामलाल भिन्नौट हो गया, भड़क उठा। चिल्लाया- ‘भाग जा शिवशंकर के बच्चे, वरना खैर नहीं तेरी... साल्ले इसी हल से ज़मीन में गाड़ दूंगा... मेरी दिल से निकली बददुआ लगेगी तुझे, देखना कीड़े पड़ेगें तुझमें... तमाशा देखने आया है हमारा... हमें कुछ नहीं चाहिए... जा भाग जा यहां से।’ शिवजी मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए ‘तथास्तु’ कह कर कट लिए। उनके अंतर्ध्यान होते ही श्यामलाल के खेत से सोने की अशर्फियां निकलने लगीं। श्यामलाल के दिन बहुर गए।
शिवजी कैलाश वापस लौटे तो पार्वती जी माथा पकड़े बैठी थीं। बोलीं- ‘धत्त तेरे की, ई धतूरे की पिनक में ये क्या कर आए प्रभु, ग़लत आदमी को वरदान दे दिया, मेरा तो कब से माथा ख़राब है... रामलाल और श्यामलाल में टोटल कंफ्यूज़ कर गए आप... जो गाली बकता था उसकी लाइफ़ सेट कर दीस।’ शिवशंकर मुस्कुराए, बोले- ‘नहीं प्रिया, हम कतई कंफ्यूज़ नहीं हैं... हमने सही आदमी को वरदान दिया है... रामलाल हमारा नाम लालच और स्वार्थ के चलते लेता है, लेकिन श्यामलाल निस्वार्थ भाव से हमारा नाम लेता है... गालियों के साथ ही सही लेकिन पूरे मन, कर्म और वचन के साथ हमरा नाम लेता है। हमारा सच्चा भक्त तो श्यामलाल ठहरा। इसलिए हम उससे प्रसन्न हुए। समझी....?’
‘आप तो एकदम से ग्रेट हैं जी।’, पार्वती जी इतराते हुए बोलीं।
मॉरल ऑफ़ द स्टोरी- जो तुम्हे बेनागा गालियां बकता है... वो तुम्हारा दुश्मन नहीं बल्कि वो तो तुम्हारा सच्चा भक्त है। उसे गाली के बदले गाली नहीं, वरदान दो वरदान। अमां अब तो अपने सच्चे भक्तों के पहचानना सीखो। मैं भी आजकल अपने सच्चे भक्तों को चिन्हित कर रहा हूं। मित्रों.... उन्हे वरदान जो देना है।
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