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Thursday, April 21, 2011

सत्य साईं- डायलासिस पर 'भगवान'


सत्य साईं की हालत गंभीर हो गई है। हवा में हाथ लहराकर भक्तों के लिए स्विस घड़ियों से लेकर लड्डू तक प्रकट कर देने का कथित चमत्कार करने वाला ये बाबा अपने लिए ही कोई चमत्कार कर पाने में असमर्थ है। असहाय है। बाबा के भक्त ये सोच कर अपने आंसू पोछ रहे हैं कि जीवन और मृत्यु से तो भगवान भी हारे हैं अस्पताल से जारी मेडिकल बुलेटिन में भी सत्य साईं को भगवान कह कर संबोधित करने वाले बाबा के अनुयायी ज्ञानी डॉक्टर, भावावेश में भगवान की परिभाषा को सत्य साईं पर समर्पित किए दे रहे हैं। जबकि भगवान तो किसी को मरणोपरांत ही कहा जाता है। फिर भी, सत्य साईं अपने भोले भक्तों के लिए वर्षों से भगवान कहलाते हैं।

कलयुग में भगवान को डायलिसिस पर भी देखना लिखा था। यही कलयुग भी है शायद। ईश्वरीय शक्तियों के सामावेश का दावा करने वाले किसी कथित महापुरुष की इतनी दयनीय हालत पहली बार देखी है। कहीं पढ़ा था कि बाबा में चमत्कार करने की कूवत बचपन से ही थी और जब बाबा दुनियादारी समझने लगे तो ख़ुद को शिरडीवाले साईं बाबा का अवतार घोषित कर दिया। बाबा के चमत्कारों से अभिभूत भीड़ ने बाबा का जयघोष कर डाला। फिर दुनिया ने बाबा का चमत्कार देखा और बाबा ने, फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कहावत है कि पीठ पीछे लोग भगवान की आलोचना करने से भी बाज नहीं आते, लिहाज़ा सत्य साईं भी गैर विवादित नहीं रहे। बाबागीरी की दुनियादारी में विवाद अक्सर ख्याति का कारक रहे हैं। सत्य साईं को भी लाभ हुआ। और उन्होने फिर ये लाभ समाज को लौटाया भी। ख़ुद ज़्यादा पढ़-लिख ना सके सत्य साईं ने दुनिया में सैंकड़ों शिक्षण संस्थान भी खोले। वो समाजसेवा करके भगवान बने या भगवान बनकर उन्होनें समाजसेवा की, ये उनके प्रशंसकों और आलोचकों के बीच बहस का मुद्दा हो सकता है।

छियानवे वर्ष की आयु में समाधि लेने की घोषणा करने वाले सत्य साईं के अंग उनके दावे की विश्वस्नीयता कायम नहीं रख पा रहे हैं। शिरडी साई बाबा के समाधिस्थ होने के आठ साल बाद आंध्रप्रदेश के पुट्टापर्थी में जन्में सत्यनारायण राजू जीवन रक्षक तंत्रों की सुविधा पाने के मामले में शिरडी साईं बाबा से ज़्यादा लकी निकले। छियानवे वर्ष की आयु में महासमाधि की घोषणा करने वाले सत्य साईं पिच्यासीवें साल में ही डायलासिस पर लेटे हैं। साईं की ये कौन सी लीला है, भक्तों की समझ से परे है। वो जल्दी ही स्वास्थ्य लाभ लें, यही कामना है।

मुझे सत्य साईं की सत्यता या असत्यता प्रमाणित करके उन्हे सच्चा या झूठा प्रचारित करने की लालसा नहीं है। लेकिन ईश्वरीय शक्तियों के कथित प्रतिनिधियों से हमेशा ही मुझे यह शिकायत रहीं है कि वो सदैव परपीड़न-कामुक अर्थात सेडिस्ट रहा है और पीड़ित ने हमेशा अपने दुखों को अपने पापों का फल समझकर भोगा है। लोगों के दुख दर्द भगवान के अधिकार क्षेत्र से हमेशा ही बाहर रहे हैं। भगवानलोग हमेशा से केवल परीक्षक और जादूगर की भूमिका में ही रहे हैं। सत्य साईं ने भी उसी परिपाटि का ग्रंथानुसरण किया है। पुट्टापर्थी जैसे छोटे से गांव का रेलवे स्टेशन तो अंतरर्राष्ट्रीय स्तर का है लेकिन रेलवे स्टेशन पर भिक्षुओं की परंपरा पर सत्य साईं का भी वश नहीं रहा। इस भगवान ने भी अपनी सामर्थ्य का दिखावा दिल खोल कर किया। फूटी कौड़ी भी ना जोड़ पाए शिरडी साईं के इस कथित अवतार के ट्रस्ट के खाते में लगभग 40,000 करोड़ से भी ज़्यादा रूपए जमा हैं। भगवानलोगों ने प्रत्येक युग में अपनी भव्यता और विलासिता का पूरा इंतज़ाम किया है और पीड़ित, असहाय, दुखी, दरिद्र और बीमार लोगों के बीच अपना आसन लगाया है जो उन्हीं लोगों ने कालांतर में मंदिरों में तब्दील कर दिया।

कोई भगवान अथवा संत दुनिया से दरिद्रता और दुख नहीं मिटा पाया। इस मामले में भगवानों के ख़ुद दरिद्र और दुखी होने के प्रमाण भी मिलते हैं। सत्य साईं के जीवनकाल में भी ऐसा ही समय चल रहा है। वैसे मीडिया सहित कई सूचना एवं संचार माध्यमों के भरपूर इस युग में सत्य साईं शायद उतना जलवा कायम नहीं कर पाए जितना प्रचार-प्रसार माध्यमों के अभावकाल में शिरडी साईं बाबा ने सिर्फ़ 'भगवान भला करेगा, अल्लाह भला करेगा' कह कर दिया। शिरडी साईं के असीम प्रभाव के समक्ष उनका ये कथित अवतार सीमित ही रह गया। ये मेरे निजी विचार भी हो सकते हैं। मेरे विचारों से यदि किसी की भावनाएं आहत हुईं हैं तो मैं क्षमाप्रार्थी भी हूं।

ये भगवान बनने और भगवान बन कर सैलिब्रटी हो जाने का युग है। ये विश्वास और अंधविश्वास के झीने अंतर को खारिज करके अंधभक्ति में डूब जाने का युग है। यहां भक्तों से ज़्यादा संख्या में भगवान होने लगे हैं। भक्त लोग जादू और चमत्कार में भेद करने का पाप नहीं करते और उनका यही भक्तिभाव किसी भी युग में अपना भगवान चुनता है। फिर ये भक्त अपने भगवान को डायलासिस पर देख कर व्यथित क्यों ना हों। मैं असमंजस में हूं कि 'भगवान' के स्वास्थ्य लाभ की कामना करूं भी तो किससे?

Saturday, April 9, 2011

अण्णा हज़ारे LIVE


इतिहास को बनते देखना, बदलते देखना और 9 अप्रैल की तारीख़ को इतिहास की किताब में आंखों के सामने दर्ज होते देखना किसी क्रांतिकारी फिल्म का पर्दे से निकलकर सार्थक होने जाने जैसा था। ये जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर अण्णा हज़ारे का जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन था। अण्णा 5 अप्रैल से अनशन पर बैठे थे। और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कोई पहली बार नहीं बैठे थे। इससे पहले भी समाज के कमज़ोर वर्ग का ये समाजसेवी मसीहा किसन बापट बाबूराव हज़ारे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 1995 से युद्ध के मैदान में है। बिना खड़ग, बिना ढाल। जिन्होने महात्मा गांधी को नहीं देखा उन्होने अण्णा हज़ारे को देखा। इस बार सत्याग्रह दिल्ली के जंतर-मंतर पर था। हालांकि इसपर दोराय हो सकती है क्योंकि आलोचनाओं का स्वागत करने की गुंजाइश हमेशा छोड़ देनी चाहिए।

लेकिन फिर भी ये सच है कि जंतर-मंतर पर पूरी दुनिया ने एक मैजिक शो होते देखा। सरकारी फ़ाइलों में 40 साल पहले ग़ायब हुआ एक बिल, बाबा अण्णा हज़ारे के छड़ी घुमाते ही बाहर निकल आया। शासन करने वाली सरकार बाबा की डुगडुगी के आगे झमूड़ा बन गई। अण्णा हज़ारे की पांचो मांगे सरकार ने मान ली। अण्णा के नेतृत्व में जनता की जीत हुई, देश की जीत हुई, लोकतंत्र की जीत हुई।

......लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं था। और ना ही इतना मुश्किल भी। बस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ क़ानून की मांग को लेकर एक सकारात्मक शुरूआत की आवश्यकता थी, जो अण्णा ने दी। लेकिन अण्णा ही क्यों? अपनी योगशक्ति से दस-पंद्रह दिन भूखे रहकर अनशन करने का काम तो बाबा रामदेव भी कर सकते थे। ....कोई भी कर सकता था। इस देश में हज़ारों लोग नवरात्रों में नौ दिन उपवास रखते ही हैं। फिर अण्णा ने ऐसा क्या कमाल कर दिया जो इससे पहले और कोई नहीं कर पाया? इसका जवाब शायद ये हो सकता है कि अण्णा, मोह-माया, भोग-विलास और सत्ता मद से बहुत दूर हैं। अण्णा को भविष्य में कोई राजनैतिक पार्टी नहीं बनानी, बल्कि उन्हे तो देश की जनता को जोड़कर आज़ाद हिन्द फौज बनानी है।

जो काम देश के बड़े-बड़े चतुर-चालाक नहीं कर पाए वो भोले-भाले अण्णा ने कर दिया। एक मंदिर के आहते में बने 8 बाई 10 के कमरे में रहने और बर्तनों के नाम पर एक थाली में खाने वाले अण्णा ने कमाल कर दिया। महात्मा गांधी भी शायद इसलिए ही कर पाए थे।

अण्णा का अनशन प्रायोजित नहीं था। होता, तो शायद वो भी अभूतपूर्व होता। लेकिन नहीं था। मैंने अनशन के तीसरे दिन मैनेजमैंट गुरू अरिंदम चौधरी को भी अण्णा से मिलने के लिए धक्के खाते देखा, इस देश के आम आदमी से भी ज़्यादा दयनीय हालत में, जबकि इस देश के आम आदमी के लिए अण्णा से मिलना उतना ही आसान रहा जैसे किसी को अपने पिता से मिलना हो। अण्णा कभी भी मुद्दे को छोड़कर अन्य किसी शह से प्रभावित नहीं हुए और यही कारण है कि जो लोग कल तक अण्णा को जानते तक नहीं थे वो अपने नंगे बदन पर ‘मैं अण्णा हज़ारे हूं’ लिखकर घूम रहे थे। विशेषकर युवावर्ग। अपने बेहतर भविष्य के लिए विदेश की ओर टकटकी लगाए युवावर्ग को इसे देश के नागरिक होने का कर्तव्य याद दिलाकर इसे बेहतर बनाने की मुहिम का हिस्सा बनने पर मजबूर करना जीवट का काम है। अण्णा रातोंरात ही लोगों के रोल मॉडल नहीं बन गए। बल्कि ये करिशमा अण्णा के व्यक्तित्व से टपकते अनुभव और आंखों से झलकती ईमानदारी का था। ऐसा ही निःस्वार्थ नेतृत्व तो देश को चाहिए था, जो देश को अपनी महत्वाकांशा की अग्नि में ना झोंक दे। जो लोगों को न्याय की फोटू दिखाकर मूर्ख ना बनाए।

मुझे जंतर-मंतर जाने का सौभाग्य अनशन के तीसरे दिन हुआ। सुबह आठ बजे से लाइव करना था। 8 अप्रैल की सुबह वहां पहुंचा तो किसी आम प्रदर्शन जैसा ही लगा वहां का माहौल। फिर जैसे-जैसे दिन के साथ अण्णा की मुहिम पर रंग चढ़ते देखा तो एक बार को मुझे भी लगा कि अण्णा कहीं ‘पीपली लाइव’ के नत्था तो नहीं बन रहे हैं? ‘अण्णा तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं’, जब तक सूरज-चांद रहेगा अण्णा तेरा नाम रहेगा...., और भी ना जाने कितने ही तुकबंदी के नारों से अटा पड़ा था माहौल। लेकिन जब लोगों से बात करनी शुरू की तो अहसास हुआ कि मैं शायद ग़लत सोच रहा था, ये भीड़ जुटाई नहीं गई है बल्कि ख़ुद-ब-ख़ुद जुटी है। कौन-कौन नहीं था उस भीड़ में। अण्णा ने किसी आमो-ख़ास को नहीं बुलाया था। अण्णा ने तो बस आवाज़ लगाई थी और कारवां बनता गया। हां, अण्णा के अनशन को भुनाने वालों की भी भरमार भी। अण्णा के साथ फ़ोटो खिंचाकर, उनके साथ मंच पर एक बार एंट्री मारकर, उनकी इस मुहिम में अपने दल-बल के साथ शामिल होकर कितने ही लोग और एनजीओ बहते पानी में हाथ धोने को बेताब थे। कई लोंगो के लिए जंतर-मंतर पहुंचना स्टेटस सिंबल बन गया था। कई महिलायें ब्यूटी पार्लर से सीधे अण्णा के अनशन स्थल पहुंचकर मीडिया को रिझाती मिलीं। कितने ही लड़के-लड़किया वहां डेटिंग कर रहे थे, पिकनिक मना रहे थे। सीधे-सपाट शब्दों में कितने ही लोग मधुर भंडारकर की ‘पेज थ्री’ को जीते हुए मिले। लेकिन इस सबके बावजूद सिक्के का दूसरा पहलू ज़्यादा प्रभावी साबित हुआ और वो ये कि लोग आए.... लोग जुड़े....।

तिहत्तर साल के नॉन ग्लैमरस् अण्णा हज़ारे की एक आवाज़ पर भ्रष्टाचार जैसे थके हुए और घिसे-पिटे मुद्दे पर इकट्ठा हुए लोगों का ग़ुस्सा उनके चेहरों की तरह लिपापुता नहीं था, ये बड़ी बात थी। अगर भ्रष्टाचार को लाइलाज बीमारी बताकर झेलते रहने वालों को भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने की उम्मीद बंधी है तो ये अण्णा के दृढ़संकल्प का ही परिणाम है।

भ्रष्टाचार को लेकर इतने बड़े पैमाने पर लोगों का संगठित होना कई नकारात्मक आशंकाओं को धव्स्त करते हुए सफलता की गारंटी देता है। भ्रष्टाचार मिटेगा या नहीं ये बाद की बात है, अभी यही क्या कम है कि एक शुरूआत तो हुई। एक ठोस और सकारात्मक शुरूआत। अण्णा के विश्वास के संक्रमण से प्रभावित जनता ने कम से कम एक पत्थर तो तबियत से उछाला ही है। अण्णा के नेतृत्व में ये जनता के सहयोग से जनता की लड़ी गई सबसे बड़ी लड़ाई कही जा सकती है। सबसे बड़ी इसलिए क्योंकि ये लड़ाई किसी कॉर्पोरेट घराने के दमखम पर नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से जनता के आत्मबल से लड़ी गई है। हां, ये भी सच है कि हाल ही मिस्र में लड़ी गई जनता की लड़ाई के परिणाम से प्रभावित इस देश के लोगों को अपनी ताक़त पर यानि आम आदमी की ताक़त पर भी भरोसा हो गया।

मीडिया की भी इस मुहिम में बड़ी ज़िम्मेदारी भरी भूमिका रही, ये अण्णा ने भी माना। मैंने पहली बार मीडिया को गाली देने वाले समाज को मीडिया की प्रशंसा करते देखा। फ़ेसबुक और ट्विटर जैसा सोशल नेटवर्किंग साइटस् ने भी इस आंदोलन को अभूतपूर्व बनाने में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं छोड़ी। देश में शायद पहली बार संचार माध्यमों का इतना सटीक इस्तेमाल होते देखा गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जनता की सबसे बड़ी लड़ाई में मिली ऐतिहासिक जीत के लम्हों का गवाह बनकर मैं गौरवांवित महसूस कर रहा हूं। अपने चैनल की तरफ से इस महाकवरेज का हिस्सा बनकर मैं भी इसमें शामिल रहा और वो भी अण्णा के इतने करीब, जंतर-मंतर पर रहकर। बस, अफ़सोस इस बात का रह गया कि लाइव कवरेज की व्यस्तता के चलते इस मुहिम के रंगों को अपने SLR कैमरे में क़ैद नहीं कर पाया। लेकिन हज़ारों कैमरों में ये ऐतिहासिक पल क़ैद हुए इसका संतोष ज़रूर है।

अण्णा की कोशिशों से 9 अप्रैल की तारीख़ जनता की जीत के तौर पर इतिहास के पन्नों में दर्ज तो हो गई लेकिन याद तभी रखी जाएगी जब ये अलख जलती रहे। जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इसके बाद किसी आमरण और अनिश्चितकालीन अनशन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी तभी सही मायनों में अण्णा की मुहिम अपने अंजाम तक पहुंचेगी। इस संकल्प के पौधे को यदि निरंतर नहीं सींचा गया तो ये मुरझाकर सूख भी जाएगा। इस जीत के जश्न में मकसद याद रखना होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एकजुट होने के लिए इस बार जैसे लोगों ने अपनी व्यस्तता के बीच भी समय निकाला है इसे अब उन्हे अपनी आदत बनाना होगा।

लोकतंत्र की ये कथित जीत आप सभी को मुबारक हो।

Thursday, November 4, 2010



मेरा पहला व्यंग्य संग्रह 'चौथा बंदर' आ चुका है।


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Friday, October 1, 2010

सारे पदक हमारे हैं

बस, एक-दो देश और कॉमनवेल्थ गेम्स में आने से तौबा कर लें तो समझो अपनी लॉटरी लग गई। अपने खिलाड़ियों की तो क़सम से निकल पड़ेगी। कोई प्रतिद्वंदी ही ना बचेगा तो अपन निर्विवाद विजेता होंगे। हर स्टेडियम में, हर मैदान में, हर ट्रैक और हर मोर्चे पर अपन बिना मुकाबले के बस पदक लेने जाएंगे। सारे पदक हमारे होंगे। मीडिया निहत्थे कलमाडी की बेवजह ही थू-थू करने की कसम उठा चुका है। अरे, ज़रा पल भर के लिए दम लेकर सोचो तो सही, अपने कलमाडी साहेब बिलकुल सही फरमा रहे हैं। वो हमेशा कहते हैं कि खेल अभूतपूर्व सफल होंगे। सही तो है। इतिहास गवाह है, इससे पहले क्या कभी ऐसा हुआ है कि सारे पदक मेज़बान देश ने ही जीते हों।

स्पर्धाएं ताक़त से नहीं, दिमाग़ से जीती जाती हैं। सलमान खान बताता तो है एक बनियान के विज्ञापन में। कलमाडी वही बनियान तो पहनते हैं। अपने खिलाड़ियों को विजय दीनानाथ चौहान बनाने के लिए कलमाडी बाक़ी देशों के खिलाड़ियों के दिमाग़ पर वार कर रहे हैं। मुक्केबाज़ अखिल कुमार के बैठते ही उनका बिस्तर क्या टूटा, मीडिया, कलमाडी पर बिस्तर से बुरी तरह टूट पड़ा। अरे भईया, यही तो रणनीति है। ये तो अखिल कुमार का प्रोमो था, जिसे देखकर प्रतिद्वंदी मुक्केबाज़ों के छक्के छूट गए होंगे। जिस मुक्केबाज़ के बैठने से ही पलंग चरमरा जाए, वो रिंग में किसी की क्या गत बनाएगा किसी की। क्यों छूट गए ना पसीने?

निर्माण में घटिया सामग्री वाली बात भी कॉमनवेल्थ गेम्स का प्रोमो है। जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के पास वाला फुटओवर ब्रिज तो हमने गिराने के लिए ही बनवाया था भई। बाक़ी देशों को यह बताने के लिए की देख लो हमने तो सब ऐसे ही बनाया है। इसमें भी कलमाडी की दूरदर्शिता प्रशंसनीय है। सभी स्पर्धाओं में प्रतिद्वंदियों को ध्यान स्टेडिम की छत और दीवारों पर ही लगा रहेगा कि कौन सी छत जाने कब गिर जाए, कौन सी दीवार पता नहीं कब ढह जाए और हमारे खिलाड़ियों को प्रतिद्वंदियों के इसी डर का लाभ मिलेगा, क्योंकि डर के आगे जीत है। डरेंगे वो, जीतेंगे हम।

ऐसे ही खिलाड़ियों को डेंगू, सांप और कुत्तों से डराने की रणनीति भी कॉमनवेल्थ गेम्स की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है। ये सब तो कॉमनवेल्थ गेम्स के ऑफ़िशियल प्रोमो हैं। सो, चियर अप विद कलमाडी।
(आज 'हिन्दुस्तान' में प्रकाशित)

Wednesday, September 29, 2010

‘या तो राम रहेगा या रहीम’

कल फैसले का दिन है। राम और रहीम दोनों कटघरे में होंगे। विडंबना ये है कि राम और रहीम दोनों को ही फैसले से कोई लेना-देना नहीं है। सियासतदानों की चाल में फंसे राम-रहीम कल जुदा हो जाएंगे। या तो राम रहेगा या रहीम। दोनों का एक साथ रहना कुछ फिरकापरस्तों को मंज़ूर नहीं है। ज़मीन पर मालिकाना हक़ को लेकर अदालत फ़रमान सुना देगी। जिन मालिकों के हक़ में फैसला आएगा वो भी ज़मीन को ना तो स्वर्ग ही ले जा पाएंगे और ना जन्नत में। नरक और दोज़ख में भी नहीं ले जा पाएंगे। लेकिन फ़ैसले को लेकर उनके ख़ून में उबाल है।

रहनुमाओं का ख़ून खौल रहा है, तो आम आदमी की रगों में फैसले को लेकर ख़ून जमता जा रहा है। लोग राशन-पानी जमा कर रहे हैं। जिनके लिए मंदिर-मस्ज़िद से ज़्यादा दो जून की रोटी ज़रूरी है वो परेशान हैं। उनका पेट ना मंदिर भरता है ना मस्ज़िद। कल क्या होगा किसको पता। लेकिन अनिष्ट की आशंका से सबकी आंखे और बाज़ू फड़फड़ा रहे हैं।

जो शिखंडी इसे जन भावनाओं के सम्मान की लड़ाई बता रहे हैं, वो भी जानते हैं कि जन भावनाएं केवल शांति और सौहार्द से जुड़ी है, मंदिर-मस्ज़िद से नहीं। कल का फैसला क्या होगा? फैसले के बाद क्या होगा? कोई नहीं जानता। जिन सफ़ेदपोशों ने कभी मंदिर-मस्ज़िद का सम्मान नहीं किया, वो कल आने वाले अदालती फैसले का सम्मान करने की बात कर रहे हैं।

मेरी मां पूछ रही है कि अगर सबको शांति ही चाहिए और सब फैसले का सम्मान ही करने वाले हैं, तो देश में हाई अलर्ट क्यों है? क्या जवाब दूं....?

Monday, September 27, 2010

बाढ़ का कवरेज बिलकुल Live

टीवी पर दिखाई जा रही बाढ़ सचमुच की बाढ़ से ज़्यादा ख़ौफ़नाक होती है। हम बाढ़ को डिफ़रेंट-डिफ़रेंट एंगल से दिखाते हैं। पूरे वैरिएशन के साथ दिखाते हैं। फिर भी ना जाने क्यूं लोग स्पॉट पर ही चले आते हैं तमाशा देखने। बाढ़ का लाइव कवरेज कर रहा “बाल की खाल” चैनल का रिपोर्टर बकलोल कुमार परेशान हो उठा है। यार, ये लोग यहां मजमा क्यूं लगाते हैं? यहां कोई ड्रामा तो चल नहीं रहा। अरे एक तो हम अपनी जान जोखिम में डालकर नदी के पानी में कमर तक उतर कर ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बाढ़ ने किसकदर लोगों का जीना मुहाल किया हुआ है, और ये तमाशबीन हैं कि हमारा ही जीना मुहाल किए दे रहे हैं।
पानी में कमर तक डूबा रिपोर्टर दमफुलाऊ इस्टाइल में नदी का घटता-बढ़ता जलस्तर बता रहा है। ‘आप देख सकते हैं कि पिछले दो घंटे से में यहीं खड़ा हुआ हूं और दो घंटे पहले जो पानी मेरी बेल्ट से नीचे बह रहा था वो अब मेरी बेल्ट से ऊपर बह रहा है। इससे आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि नदी का जलस्तर किस तेज़ी के साथ बढ़ रहा है।’ रिपोर्टर का एलान सुनकर तमाशबीन परेशान हैं। वो तो ठीक है कि नदी का जलस्तर बढ़ रहा है, लेकिन बाढ़ कित्थै है भाई? हम तो टीवी पर बाढ़ देखकर बाढ़ को ढूंढते हुए यहां तक आ पंहुचे हैं।
ब्रेक के दौरान और गहरे पानी में उतरता हुआ रिपोर्टर झल्ला उठा है। अरे अंधे हो क्या सब के सब, देखते नहीं नदी में बाढ़ आई है। नदी पगलाई हुई है। नदी का पानी लोगों के घरों में घुस रहा है। लोग फिर अचंभित हैं। किसके घर में घुस रहा है भाई पानी ? पानी घरों में कहां घुस रहा है, बल्कि लोग ही तो अपना घर लेकर पानी में घुस गए थे। ये बात और है कि तब नदी सूखी पड़ी थी। और रही बात इलाके में पानी घुसने की तो नदी को दोष क्या देना। अभी तो पिछली बरसात का जमा पानी ही मोहल्ले से नहीं निकल पाया है। रिपोर्टर सबको शत्रुघन सिन्हा स्टाइल में ‘ख़ामोश’ करा देता है। वो ब्रेक से वापस लौट रहा है।
‘जैसा कि आप देख सकते हैं, बाढ़ का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। पानी मेरी पसलियों को छू चुका है। ख़तरे के निशान से अब बहुत ऊपर बह रहा है पानी।’ लोग रिपोर्टर की बदहवासी से किनारे पर खड़े-खड़े कांप रहे हैं। रिपोर्टर ‘भागो पानी आया’ की चेतावनी जारी कर रहा है। लोग कंफ़्यूज़िया रहे हैं कि पानी शहर में घुस रहा है या रिपोर्टर पानी में। शहर में बाढ़ लोग पहले भी देख चुके हैं, लेकिन नदी में बाढ़ का ये नज़ारा उनके लिए बिलकुल नया है। शहर के लोग अपना शहर नदी में डूबा देखने की उत्सुकता में नदी के मुहाने तक खिंचे चले आए हैं। लोग नहा-धोकर पूरी तैयारी के साथ बाढ़ देखने आए हैं। गोया, बाढ़ नहीं मेला देखने आए हों। सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, रंगीन पैंट-शर्ट, क्रीम, पाउडर और लिपस्टिक की भरपूर वैराइटी देखने को मिल रही है।
रिपोर्टर उफ़नती नदी को आपदा बता रहा है लेकिन नदी का सैलाब पिछले चार दिनों से वरदान साबित हो रहा है। विश्वास ना आए तो भुट्टे वाले चचा, चाट-पकौड़ी वाले बंटी, पान-बीड़ी-सिगरेट वाले राजू और बर्फ़ के गोले वाले घीसू से पूछिए। ये लोग पहले दिन औरों की तरह ही बाढ़ का प्रकोप देखने आए थे। समझदार थे, दूसरे दिन से अपना खोमचा लेकर आने लगे। इनके लिए प्रकोप, स्कोप में बदल गया। इतनी बिक्री हो रही है कि हाथ-पांव फूले हुए हैं।
हाथ-पांव तो ख़ैर रिपोर्टर के भी फूले हैं। रिपोर्टर दर्शकों को नदी में डूबा शहर दिखा रहा है और लोग नदी में डूबा रिपोर्टर इंज्वॉय कर रहे हैं। रिपोर्टर किसी जान जोखिम ख़तरा निशान वाली जगह खड़े होकर डूबते लड़खड़ाते हुए, दर्शकों को ये बताना चाहता है कि शहर के लोग कितनी मुसीबत में हैं और किनारे पर सौ-सौ रुपए घंटे पर दो गोताख़ोर सिर्फ़ इसलिए तैनात हैं कि रिपोर्टर अगर स्टंट करते-करते कहीं ख़ुद मुसीबत में फंस जाए तो गोता खा चुके रिपोर्टर की गोता मार कर जान बचाई जा सके। ये देखिए- ‘ये भी डूब गया, वो भी डूब गया, ये भी तबाह, वो भी तबाह।’ रिपोर्टर इस तथातथित बाढ़ में सब कुछ डुबा देने पर आमादा है। और किनारे पर खड़े लोग अपने मोबाइल से बाढ़ की बजाए रिपोर्टर की तस्वीरें उतार रहे हैं। उनके लिए रिपोर्टर, बाढ़ से ज़्यादा बड़ा अजूबा है।
दूसरे ब्रेक में रिपोर्टर नदी में और अंदर उतरने की कोशिश करता है। तभी भीड़ में से कोई फ़िकरा कसता है, ‘आगे मत जाना जनाब, कुतुब मीनार से पैर उलझ जाएगा।’ भीड़ सम्वेत स्वर में अट्ठाहस कर उठती है। फिकरों का मिज़ाज बदलता जा रहा है लेकिन रिपोर्टर का अंदाज़ नहीं बदलता। वो बाढ़ पर ताज़ा अपडेट देकर ब्रेक ले लेता है- ‘बाल की खाल चैनल पर जारी है बाढ़ का ये कवरेज बिलकुल Live’

(आज 'नवभारत टाइम्स' में प्रकाशित)

Tuesday, August 31, 2010

ये ए. आर. रहमान कौन है....?

अरे भई... ये ए. आर. रहमान कौन है? क्योंकि जिस रहमान को हम जानते हैं वो तो इस देश का सबसे रचनात्मक संगीतकार है। सबसे महान। और हम ये भी जानते हैं कि एक कलाकार तभी महान बनता है, जब वो एक अच्छा इंसान हो। रहमान भी इसलिए महान हुए। लेकिन ये रहमान कौन है? ये ‘ओ...यारो ये इंडिया बुला लिया...’ वाला। ये वो रहमान तो नहीं है। कहीं से भी नहीं है। ये वो ऑस्कर लाने वाला रहमान हो ही नहीं सकता।

अख़बारों में ख़बर छपी कि रहमान ने कॉमनवेल्थ गेम्स का एंथम बनाने के लिए 15 करोड़ रुपयों की मांग की। सौदा साढ़े पांच करोड़ में पटा। और बन गया, ‘ओ...यारो ये इंडिया बुला लिया...’। उम्मीद थी कि रहमान जादू कर देंगे। जैसा कि वो करते आए हैं। उम्मीद थी कि शकीरा के वाका-वाका की नानी याद आ जाएगी। लेकिन हो गया अपना ही टांय-टांय फिस्स। अब थू-थू हो रही है। सवाल उठ रहे हैं कि इस गीत का मुखड़ा ही बेहद अजीबोग़रीब है। इसमें हिन्दी ही सही नहीं है। ना संगीत की कसौटी पर खरा, ना गीत की कसौटी पर और ना रोमांच की कसौटी पर।

कॉमनवेल्थ गेम्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा इस गीत को सुनकर भनभना रहे हैं। कांग्रेस वाले भी मुंह बिचकाए घूम रहे हैं। पता नहीं शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी और उनके मंत्री समूह ने इस गीत को पास कैसे कर दिया?

लेकिन शिकायत इन राजनेताओं से नहीं है। इनकी तो ज़ात ही ऐसी है। शिकायत तो रहमान से है। जो 15 करोड़ और साढ़े पांच करोड़ के गीत में फ़र्क कर गए। कॉमनवेल्थ गेम्स का एंथम बनाने के लिए रहमान पर कोई दबाव नहीं था। कोई मजबूरी भी नहीं थी उनकी। मना कर देते। नहीं बनाऊंगा गीत अगर 15 करोड़ से एक पैसा भी कम दोगे तो। कम से कम अपने फ़न और देश के साथ धोखा करने के इल्ज़ाम से तो बच जाते। पंद्रह से साढ़े पांच करोड़ की बार्गेनिंग में अपना स्तर भी गिरा लिया। और अगर इतने ही महान हैं रहमान तो देश के सम्मान और गौरव(?) की ख़ातिर मुफ़्त में ही बना देते गीत। बिना पैसे और पुरुस्कार का लालच किए। तब वो शायद और भी महान कहलाते। पैसा कमाने के और भी विकल्प और अवसरों की कमी तो है नहीं रहमान को।

लाख़ों-करोड़ो के फेर से कहीं ऊपर उठ चुके रहमान ने साढ़े पांच करोड़ में बनाया भी तो क्या, ‘ओ...यारो ये इंडिया बुला लिया...’। मतलब ये कि अगर डील एक करोड़ में तय होती तो क्या रहमान कोई ‘भोजपुरी’ गाना दे देते। दे ही देते शायद। वैसे भी रहमान कोई भोजपुरी गाना बनाएंगे तो कम से कम लागत तो एक करोड़ ही आएगी। तामझाम तो पूरा लगाएंगे ही ना। देखा आपने, तंज़ ही तंज़ में कितनी सीरियस बात सामने आ गई। सीरियसली कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए कोई भोजपुरी गाना ही होना चाहिए था। इससे एक तो हिन्दुस्तान की इस अहम क्षत्रीय भाषा को एक जायज़ मुकाम, अंतर्राष्ट्रीय पहचान और सम्मान भी मिल जाता और दूसरा भोजपुरी गीत बेशक़ रहमान के ‘ओ...यारो ये इंडिया बुला लिया...’, से कहीं बेहतर भी होता।