लो, कहानी में ट्विस्ट आ ही गया। वैसे भी छोटे मिंया की शादी में कानफोड़ू संगीत पर ट्विस्ट का इंतजाम तो था नहीं। सो, ट्विस्ट इसी बहाने आ गया। वैसे शादी-विवाहों के अवसर पर ट्विस्ट तो होना ही चाहिए, वैसा नहीं तो ऐसा ही सही।



गनीमत है मद में मस्त इस बाला ने यह नहीं कहा कि मैं उसके बच्चे की मां बनने वाली हूं। वरना कहानी पूरी फिल्मी होती। ऐन शादी के मंडप में धुसकर यह कहना कि 'ठहरो यह शादी नहीं हो सकती, मैं दुल्हा बने बैठे अमुक लड़के के बच्चे की मां बनने वाली हूं।', यह न जाने कितनी ही हिट फिल्मों का निहायत ही बासी और उबाऊ प्लॉट है। इस सीक्वेंस के बाद दर्शक इसी जिज्ञासा में बाकी दो घंटे की फिल्म झेल जाता था कि तथातथित पीड़िता के बच्चे का बाप दरअसल है कौन। अंत में पता चलता था कि पीड़िता के पेट में बच्चा नहीं बल्कि तकिया है। पैसों के लालच में किसी के बहकावे में आकर उसने ऐसा किया।
इधर छोटे मियां को घेरने वाली इस बाला के दोस्तों ने भी बताया कि बाला पब्लिसिटी के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। वैसे आजकल किसी भी क्षेत्र में ट्विस्ट के बिना कहानी में क्लॉइमेक्स जमता ही नहीं। मामला शादी का हो, प्यार-मौहब्बत का हो या फिर राजनीति का। कहानी में ट्विस्ट जरूरी है। मोहब्बत, जंग और राजनीति में सब जायज है। बीजेपी के निर्माता-निर्देशक आजकल सीड़ियों से कहानी में ट्विस्ट ला रहे हैं। राहुल बाबा अपने चटपटे बयानों से कांग्रेस की कहानी में ट्विस्ट लाने की जुगत में हैं। राजनीति में ट्विस्ट का फैशन इतना हिट हो चला है कि अब तो ट्विस्ट की ही राजनीति नजर आती है। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी और न जाने कितने ट्विस्ट देखने को मिलेंगे। बस फर्क इतना ही है कि छोटे मियां की शादी के मौके पर बवाल करने वाली मायावी बाला ने अपने ही हाथ की कलाई पर चाकू चलाया और राजनीति में दूसरे की कलाई पर चाकू चलाने का रिवाज है।
2 comments:
:) :) सही कहा भाई इस विश्लेषण में सचमुच मजा आ गया…।
बढ़िया
Post a Comment