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Wednesday, June 9, 2010

आप ज़िदा हैं या मर गए...? हो जाए एक छोटा सा टेस्ट...


बहुत मुश्किल काम नहीं है ये जानना कि हम ज़िदा हैं या मर चुके हैं। नहीं...नहीं...ये पुनर्जन्म पर किसी अति महत्वाकांशी टीवी चैनल का टोने-टोटके वाला शो नहीं है, बल्कि ख़ुद अपने आप से आपका साक्षात्कार है। तो हो जाए एक छोटा सा टेस्ट-
1- क्या कभी बिलकुल अकेले में बैठकर ख़ूब रोने का मन करता है आपका? ऐसा लगता है क्या कि चलो दुनिया को तो एहसास दिला दिया कि हम हिम्मत नहीं हारे हैं, हमारी ताकत, हमारा हौंसला किसी भी विपरीत परिस्थिति में हमारे साथ है, लेकिन अब कुछ देर के लिए किसी नितांत ख़ाली साउंड प्रूफ़ कमरे में जाकर ज़ोर-ज़ोर से रो लें। इतनी ज़ोर से कि कमरे की दीवारें थर्रा जाएं, लेकिन आवाज़ बाहर ना जाए?

2- आप कहीं से अपने घर तक रिक्शा में आएं हैं। लगते हैं तीस रुपए लेकिन आपने रिक्शेवाले से कहा कि बीस में चलना है तो बोलो, और वो किसी मजबूरी के चलते तैयार भी हो गया। सूरज 46 डिग्री पर जला रहा है और रिक्शावाला पसीने से तरबतर आपको आपके घर छोड़ता है। क्या आपने उससे कभी पूछा है- ‘भाई, रुको थोड़ा पानी पीकर जाना।’

3- क्या कभी अपने घर काम करने वाली नौकरानी की बच्ची को, अपने बच्चे का वो वाला खिलौना उठाकर दिया है जो उसे भी बहुत पसंद है और आपके बच्चे को भी?

4- मैंने ये तस्वीनौएडा में सेक्टर 26 के एक मैरिज होम के पास खिंची है। इसे ऐसे जूठी प्लेट चाटते देखकर मैं ख़ुद को रोक नहीं सका। अपनी कार वापस लौटाकर लाया इसकी फ़ोटो खिंची और इसे दस रुपए देकर पास खड़े कुलचे-छोले के ठेले से खाना खिलाया। आस-पास के लोग मुझे ऐसा करते देखकर हंस रहे थे। क्या आपने कभी हंसने वालों की परवाह किए बगैर किसी भूखे को खाना खिलाया है? मंदिर में जाकर ग़रीबों को तो सब खिलाते हैं, लेकिन बिना किसी प्रयोजन के अपनी व्यस्तता से समय निकालकर किसी को दिया है?

5- सड़क पर किसी के एक्सीडेंट के बाद उसे तड़पता देखकर, पुलिस केस कि परवाह किए बिना, क्या आप मदद के इरादे से कभी रुकें हैं?

6- सब्ज़ीवाले या फिर किसी दुकानदार को खरीददारी के बाद आपको लौटाने थे साठ रुपए, लेकिन ग़लती से उसने आपको लौटा दिए सत्तर रुपए। क्या आपने कभी अपने पास ज़्यादा आ गए दस रुपए उसे वापस किए हैं?

7- जब आप मॉल घूमने जाते हैं और आपको किसी का गोलूमोलू बच्चा बड़ा प्यारा लगता है तो आप प्यार से उसके गाल पर चुटकी ले लेते हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर जब आपसे कोई महिला अपने बच्चे को गोद में लेकर भीख़ मांगती है तो क्या उसकी गोद में चिपके बच्चे के प्यारा लगने पर आप उसके गाल पर थपकी दे पाते हैं? या किसी भी गंरीब के बच्चे के साथ क्या आप ऐसा कर पाते हैं? (माफ़ कीजिएगा, नेता लोगों का अक्सर ग़रीब के बच्चे को गोद में उठाकर दुलारना यहां मान्य नहीं होगा)

8- किसी होटल या रेस्त्रां में खाना खाने के बाद आप बैरे को पांच-दस रुपए टिप में ज़रूर देते हैं। लेकिन क्या उस रेस्त्रां में रखे किसी NGO के ड्रॉप बॉक्स पर आपका ध्यान गया है, जो विगलांग बच्चों, कैंसर पीड़ितों अथावा मानसिक रोगियों कि मदद के लिए रखे गए हैं? क्या आपने उसमें कभी पांच या दस रुपए डाले हैं?

9- हॉस्पिटल में इलाज के बाद या घर में बीमारी के बाद बची हुई दवा क्या हॉस्पिटल के रिसेप्शन पर रखे ड्रॉप बॉक्स में आपने कभी डाली है, जिस पर लिखा होता है- ‘ग़रीबों और असक्षमों की मदद करें, बची हुई दवा इस बॉक्स में डालें’?

10- दफ़्तर से हारे-थके लौटने के बाद भी क्या कभी बिना कहे अपने बूढ़े माता-पिता के पैर दबाए हैं? और दफ़्तर से कमरतोड़ थकावट लेकर लौटने के बाद मन ना होते हुए भी अपने साथ खेलने की अपने बच्चे की ज़िद पूरी की है?
इनमें से किन्हीं पांच सवालों का जवाब भी अगर ‘हां’ में है, तो, यक़ीन जानिए आप अभी ज़िंदा हैं..... मरे नहीं हैं।
नोट- बड़े ही अफ़सोस के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि ख़ुद को इन सवालों के जवाब देने के बाद मैंने पाया कि मैट्रोपॉलेटियन शहर के समाज की संदिग्ध परिस्थितियों के चलते, मैं 'मर' चुका हूं।

13 comments:

sandhyagupta said...

..ख़ुद को इन सवालों के जवाब देने के बाद मैंने पाया कि मैट्रोपॉलेटियन शहर के समाज की संदिग्ध परिस्थितियों के चलते, मैं 'मर' चुका हूं।

chaliye aap akale nahin hain.

honesty project democracy said...

वाह क्या लाजवाब विषय और लाजवाब सोच ,बहुत ही उम्दा प्रस्तुती और हम तो इतना कह सकते हैं की हम मरे तो नहीं है लेकिन जिन्दा है पर ICU में हैं ....क्या पता जिन्दगी की मजबूरियां बची-खुची इंसानियत को कब मार दे इस बेदर्द और भ्रष्ट व्यवस्था के ज़माने में | इस बेहद गंभीर विचारणीय प्रस्तुती के लिए *******

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut sudrad sawaalo ke katghare me laa khada kiya hai aapne logo ko is bhaag daud ki jindgi me. sarthk post.

kal 11/6/10 ke charcha munch k liye apki post chun li gayi hai.

http://charchamanch.blogspot.com/

abhaar

दिलीप said...

mara to nahi par adhmara zarur ho gaya hun...par koshish jaari hai zinda rehne ki...

Unknown said...

Excellent quiz..
But i must say that I am still alive and remembering an good old phrase.
"You can close your eyes to the things you don't want to see, but you can't close your heart to the things you don't want to feel."
So if atleast you still have those feelings,means you are still "Alive".
:-)

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त प्रश्न उठाये हैं...आखिरी सांस पर हूँ.

मीनाक्षी said...

ज़िन्दा रहने की कोशिश में लगे हैं..

मनोज भारती said...

जिंदा रखने का एक अच्छा प्रयास ...शायद ये सांसे चलती रहें ।

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

बेहद कमाल की सोच और लाजवाब प्रस्तुति!
बस साँसें चल रही हैं..किसी तरह

vandana gupta said...

बहुत ही संवेदनशील पोस्ट्………………हाँ जी कुछ ज़िन्दा रहने की कोशिश में लगे हैं।

Abhishek Chaurey said...

bhagwan ka shukra hai ki abhi zinda hu , par shayad mahanagar me nahin rahta chhote shahar se hu isliye hi bach paaya hu...

माधव( Madhav) said...

touching post

Suman said...

kaafi dilchasp likhate hai aap.........