Followers

Sunday, August 15, 2010

पीपली लाइव का इतना पोस्टमॉर्टम क्यों...?

क्या आमिर खान किसी फ़िल्म से अपना नाम जोड़कर उसे एक अमर कृति बना सकते हैं...? शायद नहीं...। मेरा मानना है कि कोई भी फ़िल्म सिर्फ़ दर्शकों की नज़र-ए-इनायत पर जीती या मरती है। अरे... बाक्स ऑफ़िस गवाह है, कि आमिर ख़ुद अपनी कई फ़िल्में उसमें हीरो होते हुए भी नहीं बचा पाए थे। लेकिन देख रहा हूं कि मीडिया के कुछ अंधविश्वासी लोग लगातार ये कह रहे हैं कि अगर आमिर का नाम इस फ़िल्म से नहीं जुड़ता तो इसका भविष्य अंधकार में होता। ऐसा नहीं है भाई, फ़िल्म 'तेरे बिन लादेन' को किस आमिर खान ने प्रमोट किया था? फ़िल्म बिना किसी सैलिब्रिटी स्टेट्स के हिट हुई या नहीं।

'पीपली लाइव' के बारे में ये कथित बुद्धिजीवी कहते फिर रहे हैं कि इस फ़िल्म में किसानों की आत्महत्या और मीडिया का मज़ाक बनाया गया है। मैं भी मानता हूं कि इस फ़िल्म में एक गंभीर विषय को थोड़ा मज़ाहिया लहजे में पेश किया गया लगता है, लेकिन वो सब वास्तविकता के धरातल पर है। सब कुछ सिचुएशनल है, जिसे देखकर हंसी आ जाना इंसान की स्वाभाविक प्रवृति का एक पक्ष है। इस फ़िल्म में किसी किरदार, किसान या विषय की खिल्ली नहीं उड़ाई गई है.... ये तो आलोचक हैं, जो ख़ुद को हंसने से नहीं रोक पाए, फ़िल्म देखते हुए कुछ देर बाद उन्हे लगता है कि अरे वो तो ख़ुद पर ही हंस रहे हैं, और जब वो किसी तरह अपनी हंसी रोक भी लेते हैं तो ऑडिटोरियम में दर्शकों की हंसी उन्हे मुंह चिढ़ाती है। लेकिन ये दोष तो हंसने वालों का है ना, ना कि फ़िल्म बनाने वालो का।

अब देखिए, फ़िल्म की शुरुआत में ही बुधिया और नत्था अपनी ज़मीन चले जाने की कल्पना मात्र से परेशान हैं.... ऐसे में नत्था जो बुधिया के पीछे चल रहा है... गीत गुनगुनाने लगता है.... तभी बुधिया पीछे मुड़कर कहता है कि ‘ससुर यहां गां_ फटी पड़ी है और तुझे गाना सूझ रहा है।’, मेहरबानों-कद्रदानों अब ज़रा बताना कि इस सवांद में ठहाका लगाने वाली क्या बात है..? जबकि सिनेमाहॉल में इस सवांद पर ज़ोरदार ठहाका लगता है। अरे ज्ञानियों, दिन में ना जाने कितनी बार दफ़्तर में किसी ज़रूरी काम के दबाव में अपने सहकर्मियों से ऐसा बोलते होंगे आप... तो क्या आप कॉमेडी कर रहे होते हैं..? या फिर अपनी झिझक मिटाने को और अपने ठहाके को जस्टीफ़ाई करने के लिए.... आप फ़िल्म को दोष देकर ये सोच रहे हो कि आपने तो आमिर, अनुषा और महमूद की क्लास ले ली।

माफ़ी चाहूंगा, लेकिन क्रांति लाने का दावा करने वाले टीवी के कुछ पत्रकार जहां सालों की वरिष्ठता कमाने के बाद भी एक अच्छी स्टोरी कवर नहीं कर पाते... अपनी स्टोरी की स्क्रिप्ट तक नहीं लिख पाते, वहां पत्रकार रहे अनुषा रिज़वी और महमूद फ़ारूकी ने एक गंभीर विषय पर लाजवाब फ़िल्म बनाई.... एक ऐसी फ़िल्म जिसे देखने के लिए देश के दर्शक टूट पड़े हैं। फ़िल्म के मेकर पहले ही जानते होंगे कि उन्हे कुछ अधपके दिमागों की आलोचनाओं से दो-चार होना पड़ेगा। लेकिन की फ़र्क पैंदा है। जो मीडियाकर्मी इस फ़िल्म की आलोचना कर रहे हैं उन्हे बता दूं कि सीधा सा सिद्धांत है, आपको लगता है कि पीपली लाइव एक बकवास फ़िल्म है, तो केवल आपके बकवास कह देने से फ़िल्म की सेहत पर क्या फ़र्क पड़ जाएगा, क्योंकि कई बार बकवास दिखाने की आलोचनाएं झेलने के बाद भी मीडिया की सेहत पर क्या फ़र्क पड़ जाता है? आप फ़िल्म 'तेरे बिन लादेन' पर क्यों खामोश रहे, जबकि उस फ़िल्म में भी पत्रकारों की भूमिका घेरे में ही दिखाई गई है। बताया गया है कि गैरज़िम्मेदाराना पत्रकारिता किस तरह विध्वंस का कारण बन सकती है। लेकिन कुछ भाईलोग इसलिए परेशान हैं क्योंकि फ़िल्म 'पीपली लाइव' देखकर सिनेमाहॉल से बाहर निकलते शायद उन्हे शर्म महसूस हुई है। आईना देखकर डरना नहीं, संवरना चाहिए।

और फिर क्या ये सच नहीं है कि इस फ़िल्म को लेकर मीडिया का इंटरेस्ट भी आमिर खान में ही ज़्यादा रहा। आमिर का नाम जोड़कर फ़िल्म की सबसे ज़्यादा पब्लिकसिटी भी तो मीडिया ने ही की। आमिर से बड़ा कोई और नाम भी तो इस फ़िल्म से नहीं जुड़ा था। रही बात निर्देशक के काम की तारीफ़ की तो वो तो फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद की ही बात है, और फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद अनुषा और महमूद को किसने नहीं जाना।

आमिर ने इस संबंध में पूछे गए सवाल पर हमारे चैनल में सही कहा था कि अनुषा ने इस फ़िल्म में किसी को नहीं छोड़ा। कोई राजनेता इस फ़िल्म को देखेगा तो उसे लगेगा कि किसानों, मीडियावालों और पुलिसवालों के बारे जो दिखाया गया वो तो एकदम ठीक है लेकिन हमारी छवि को नुकसान पहुंचाया गया है। और ऐसा ही पुलिसवालों, मीडियाकर्मियों और किसानों को भी लग सकता है। और यही तो लग रहा है।

और जो लोग ये कह रहे हैं कि इस फ़िल्म में किसानों की आत्महत्या जैसे गंभीर विषय का मज़ाक बनाया गया है, वो अपनी विशलेषणात्मक प्रतिभा का लाभ उठाते हुए ये क्यों नहीं सोचते कि इस फ़िल्म में ये दिखाया गया कि किसी के बहकावे में आकर कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए, जैसा नत्था और बुधिया ने उठाया। और फिर मेले-तमाशे वालों ने उठाया, मीडिया ने उठाया, नेताओं ने उठाया। बेचारे लोग किस तरह से अव्यवस्था के संक्रमण का शिकार हो जाते हैं और व्यवस्था कैसे किसी कि मजबूरी का फ़ायदा उठाती है ये फ़िल्म की थीम है। ग़रीब, दबे-कुचले लोग इस देश में रहनुमाओं के लिए एक लतीफ़ा ही तो हैं। वरना किसे न्याय मिला है आज तक..? क्या ग़लत कहती है फ़िल्म की यहां मरने के बाद तो मुआवज़ा मिलता है लेकिन किसी को कुव्यवस्था से प्रताड़ित होकर मरने से रोकने के लिए कोई योजना नहीं है। ये फ़िल्म ऐसे किसानों के लिए काम करने का दावा करने वाले ngo’s पर भी निशाना साधती है।

फ़िल्म की महिला रिपोर्टर भी तो फ़िल्म में पीपली गांव के स्थानीय रिपोर्टर से कहती है कि ‘अगर तुम्हे PUBLIC INTEREST में ख़बर की अहमियत को अंदाज़ा नहीं है तो I M SORRY, U R IN THE WRONG PROFFESION’ और बाद में उस संवेदनशील स्थानीय पत्रकार की मौत हो जाती है। मैं अब तक नहीं समझ पाया हूं कि अनुषा ने फ़िल्म में इस सीक्वेंस के ज़रिए एक फ़िल्मी किरदार की मौत दिखाई है या पत्रकारिता की मौत का संकेत दिया है।

माफ़ कीजिएगा, पीपली लाइव पर ये मेरी नितांत निजी राय हो सकती है।

Friday, August 6, 2010

कहां होगा मेरा ‘रे-बैन’…?

दिन में कई बार ऐसा लगता है जैसे रे-बैन का मेरे वो चश्मा मुझे याद कर रहा होगा। रो रहा होगा। वो ना भी रो रहा हो लेकिन उसकी याद में मेरी आंखें ज़रूर नम हो जाती हैं। हंसने की बात नहीं है। कुछ चीज़े बेजान होती हैं, लेकिन उनमें जान बसने लगती है। मेरे साथ जनपथ मार्केट में जो हादसा हुआ उसमें वो चश्मा भी चला गया। कोई उचक्का, वर्दीवाले गुंड़ों के सामने से उसे ले भागा। मेरा वो प्यारा रे-बैन या तो उस मुस्टंडे की नाक पर सजा होगा या मुमकिन है उसने अगले ही पल अगले ही चौराहे पर उसे 500 या 1000 रुपए में बेच खाया हो। कहां होगा मेरा ‘रे-बैन’…?


मेरे लिए वो सिर्फ एक चश्मा नहीं था। जब पहली बार 6290/- का ख़रीदकर मैंने उसे पहना था तो एक तरह से बरसों पुराना एक ख़्वाब मेरी आंखों के सामने तामीर हो चुका था। बरसों की ज़िद थी कि चश्मा पहनूंगा तो रे-बैन का। शोरूम पर जाता था, तरह-तरह के चश्में लगाकर आईने में देखता था और क़ीमत देखकर वापस लौट आता था। हमेशा ही रे-बैन का चश्मा मेरे लिए बहुत मंहगा होता था। और मेरे लिए ही क्यों मेरे जैसे मध्यमवर्गीय आदमी के लिए रे-बैन मंहगा ही तो है। कभी पैसे होते भी थे तो रे-बैन के चश्मे की ख़रीदारी फ़िज़ूलखर्ची लगती। उससे भी ज़्यादा कई अहम काम सामने मुंह बाए खड़े होते। कभी चश्मे के लिए जमा पैसे LIC की किस्त में मिलाने पड़ते, कभी बीमारी-हारी में खर्च हो जाते, कभी कहीं तो कभी कहीं....। रे-बैन का चश्मा खरीदना हर बार मंहगा शौक़ मानकर ख़ारिज कर देना पड़ता था।

छोटी-मोटी कई ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ किया कि, नहीं इसके बिना भी काम चल जाएगा.... इस बार बारी रे-बैन की। लेकिन हर बार मन मसोस कर रह जाना पड़ा।
ना जाने कब-कब और कहां-कहां उसकी कमी महसूस होती थी।

फिर वो दिन भी आया जब मैंने अपना पहला रे-बैन ख़रीदा। आज से कोई एक साल पहले। या शायद एक साल भी नहीं हुआ होगा उसे। सबसे पहले उसे घर लाया तो उसके चारों ओर सफ़ेद कागज़ लगा कर उसकी फ़ोटो खींची (वो फ़ोटो यहां लगा रहा हूं)। मेरा रे-बैन मेरे लिए बड़े शान की बात थी। किसी मुक़ाम की तरह ही संघर्षों से पाया था मैंने उसे। रोज़ नियम से उसकी देखभाल करना, ऑफ़िस जाते वक़्त करीने से उसे साफ करके पहनना और ऑफ़िस पहुंचकर सावधानी से उसे साफ़ करके केस में वापस रखना, कहीं लाते-ले जाते समय बच्चों की तरह उसकी फ़िक्र करना, रह-रहकर सबकुछ कई बार याद आ जाता है दिन में।

अब पता नहीं एक बार फिर कब तक ले पाऊंगा रे-बैन। लेकिन लूंगा ज़रूर। ज़िद का पक्का हूं मैं। और जब तक नहीं ले पाऊंगा तब तक क्या करूंगा....? तब तक मेरी एक मित्र का गिफ़्ट किया हुआ ‘Police’ का ग्ल्येर पहनूंगा। मेरे लिए खास UK से लाईं थीं वो। थैंक्स अनु।

रे-बैन का दूसरा चश्मा ले भी लूंगा तो पहले वाले को कभी नहीं भूल पाऊंगा। उसकी याद करके अब भी मन भारी है और रहेगा भी।

कहां होगा मेरा ‘रे-बैन’…?

Thursday, July 29, 2010

पुलिस और तमाशबीनों के बीच बिलकुल अकेला था मैं

अब लग रहा कि अरुण जी से पूछ लेता कि बिना पूछे मेरा ऑफ क्यूं चेंज किया सर? हर बार मेरा ऑफ Friday को होता है लेकिन इस बार ना जाने क्यूं ऑफ Wednesday कर दिया गया। मुझे भी कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा था इसलिए मैंने अरूण जी से कुछ नहीं कहा। घर वाले कह रहे हैं कि इस बार भी ऑफ Friday ही होता तो शायद ये सब ना हुआ होता। शायद होनी टल जाती।

अब लग रहा है जैसे Wednesday ऑफ मिला ही इसलिए था कि मेरा एक छः फुटे दबंग ड्राइवर से झगड़ा हो जाए, मेरा माथा, नाक और ठोड़ी फूट जाए, ठोड़ी पर पांच टांके आएं, मेरा 6290/- का चश्मा खो जाए और 3000/- का भिल्लड़ अस्पताल में बन जाए। और कोई मदद करने वाला तक ना हो।

हुआ यूं कि मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ कनॉट प्लेस गया था। अक्सर ऑफ वाले दिन हम लोग मम्मी को लेने उनके ऑफिस रक्षा भवन चले जाते हैं। लांग ड्राइव भी हो जाती है और एक दिन मम्मी भी बसों में धक्के खाने से बच जाती हैं। मम्मी का ऑफिस छूटने में अभी वक़्त था तो हम लोग साउथ इंडियन खाने cp में सरवना भवन चल गए। खाया पिया और जनपथ चले आए। बेटी कार में ही सो चुकी थी। पत्नी को जूट का बैग लेना था, मैंने कहा बच्ची को सोने देते हैं तुम जाकर बैग ले आओ, मैं यहीं रोड साइड गाड़ी लगा कर इंतज़ार करता हूं। बीवी चली गई तो मैंने अपने बॉस मिलिंद जी को फ़ोन लगा कर एक कार्यक्रम के संबंध में उनसे चर्चा की। बात करते-करते मैंने देखा की आगे और जगह थी। बात ख़त्म करके मैंने गाड़ी gap में एक Tavera टेक्सी के पीछे लगा दी। गाड़ी लगाने की देर थी कि उसका ड्राइवर उतर कर गंदी-गंदी गालियां बकने लगा। जबकि मेरी गाड़ी उसकी गाड़ी से काफी फ़ासले पर थी लेकिन पता नहीं क्यूं वो ग़ुस्से में पागल सा हो रहा था। मुझे अभी तक उसके ग़ुस्से की वजह समझ नहीं आई। मैंने कहा गाली क्यूं बक रहा है भाई, आराम से बात कर ले। वो धूंसा दिखाकर और गालियां बकने लगा। मुझे अक्सर ग़ुस्सा नहीं आता लेकिन कोई किसी को बिना बात ऐसे गाली कैसे बक सकता है। मैंने उससे कहा कि रूक साले तुझे अभी देखता हूं।

ये कह कर में बेटी को गाड़ी में सोता छोड़कर पीछे खड़ी पीसीआर की ओर दौड़ा। पीसीआर में एक ही पुलिसवाला बैठा था। मैंने उसे अपने स्टार न्यूज़ का परिचय देते हुए बताया कि एक ड्राइवर बेवजह गाली-गलौज कर रहा है। वो बोला कि जी मैं तो गाड़ी में अकेला हूं कभी भी कोई वायरलैस आ सकता है। साहब राउडं पर गए हैं, आप रुको अभी आते होंगे। मैंने कहा मेरी बेटी गाड़ी में अकेले सो रही है, मैं रुक नहीं पाउंगा आप जल्दी से किसी को भेजो। कह कर मैं जैसे ही अपनी कार की तरफ आया तो देखा कि वो अपनी टेक्सी लेकर भाग रहा है। मैं चिल्लाया। लेकिन वो नहीं रूका। वो लगातार गालियां बक रहा था। मैंने भागकर उसका गिरेबान पकड़ लिया। वो मेरे हाथ पर धूंसे मारने लगा। मुझे ग़ुस्सा आ गया और मैं उसके एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया। बस! वो उतरकर मुझ पर पिल पड़ा। मैंने देखा पुलिस के कुछ लोग उधर ही आ रहे थे। मैंने तुरंत उनसे मदद मांगी लेकिन उसने पुलिस के सामने ही मेरे चेहरे पर तीन पंच मारे। मेरा ray ban का मंहगा चश्मा वहां गिर गया और उसे फ़ौरन ही कोई उचक्का लेकर भाग भी गया। देखिए, ये सब दिल्ली पुलिस के मुस्टंड़ों के सामने हो रहा था। उसके हाथ में लोहे का कड़ा था जिससे मुझे ज़्यादा चोट पहुंची। मेरी नाक और ठोड़ी से खून का फव्वारा छूटने लगा। मेरा सिर चकराने लगा। तमाशबीन इक्टठा होने लगे। मैंने जैसे-तैसे फ़ोन करके अपनी पत्नी को वापस बुलाया। और चुंकि मिलिंद सर का नंबर री-डायल लिस्ट में था, सो उन्हे फिर से फ़ोन लगाया लेकिन शायद मिलिंद वयस्त रहे होगें, उन्होने फ़ोन नहीं उठाया। मुझे बेहोशी छाने लगी थी। बेटी अभी भी कार में सो रही थी। पत्नी लौटी तो मेरी हालत देखकर बौखला उठी। मेरा चेहरा ख़ून से शराबोर था। उसने वहां खड़े पांच-छः पुलिसवालों से मदद मांगी। पुलिसवाले हंस रहे थे। बोले- बोलो मैडम क्या करना है... ड्राइवर तो ये रहा हमारे साथ.... चलो थाने ले चलते हैं इसको... आपको भी चलना पड़ेगा थाने....।

मैंने कहा- मैं थाने जाने की स्थिति में नहीं हूं, मैं पहले हॉस्पिटल जाऊंगा। पुलिसवाले बोले कि ठीक है...फिर आप हस्पताल जाइए.... इसे छोड़ देते हैं। मैं पुलिस और वहां के लोगों का रवैया देखकर हैरान था जो चाहते थे कि मैं पहले अपने बीवी-बच्चों और अपने बारे में सोचूं और ड्राइवर को माफ़ कर दूं क्योंकि वो ग़रीब है बेचारा। इससे ज़्यादा वहां कोई मेरी मदद को तैयार नहीं था। बल्कि लोगों ने मेरी बीवी को यहां तक समझाया कि मैडम आप इस चक्कर में पड़ी रहेंगी और दस मिनट में यहां आपकी गाड़ी का सारा सामान गायब हो जाएगा, भाईसाहब को समझाइए और निकलिए यहां से। पुलिस अब तक दूर जाकर खड़ी हो चुकी थी। मेरी बीवी ने पुलिस से फिर कहा कि आप उसे पकड़ते क्यूं नहीं.... मेरे हसबैंड स्टार न्यूज़ में हैं, एंकर हैं और देखिए उनके चेहरे से कितना खून बह रहा है। एक पुलिसवाले ने तंज़ कसा- टीवी पर तो ये हम लोगों को भी खूब दिखाते हैं। मुझे लग रहा था मैं बेहोश हो जाऊंगा। मैंने अपनी पत्नी को बुलाया और कहा कि यार, मुझे चक्कर आ रहे हैं अभी चलो। मैंने उसकी टैक्सी का नंबर नोट किया- UP 17C 8622, उसका नाम पूछा- नेगी। उसका नंबर लिया। और जैसे-तैसे मां के ऑफिस तक पहुंचा।

मम्मी के ऑफिस पहुंचकर मुझे नहीं पता फिर क्या हुआ। मैं बेहोश हो गया। मम्मी के ही एक भले मानस सहकर्मी ए.के.शर्मा मेरी कार ड्राइव करके लाए। मैं पूरे रास्ते गफ़लत में रहा। नौएडा आते ही मैक्स अस्पताल पहुंचा। अस्पताल पहुंचते ही मुझे उल्टियां हुईं। डॉक्टर ने दिलासा दिया कि कोई घबराने की बात नहीं है। ठोड़ी पर टाकें आएंगे। पांच टांके आए। सातवें दिन टांके कटेंगे।

अब जब होश में आया हूं तो लग रहा है नेगी को सबक सिखाऊं। कम से कम FIR तो करा ही दूं उसकी। लेकिन अभी-अभी सहारा के मेरे दोस्त प्रशांत, अब्बास, मुर्तज़ा और बृज भूषण आए थे, बोले- छोड़ो यार, जान बची तो लाखों पाए। कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। आगे से याद रखो, सड़क पर पंगा कभी नहीं लोगे। हाथ जोड़ो और निकल लो वहां से, ज़माना नहीं है भाई किसी से उलझने का।

कमाल है, क्या ज़माना इतना खराब हो चुका है कि आपसे कोई कभी भी कहीं भी पंगा लेले लेकिन आप किसी से पंगा मत लो। पुलिस भी मदद नहीं करती। सच कह रहे हैं शायद वो। जनपथ में पुलिस और सैंकड़ों तमाशबीनों के बीच मैं कितना अकेला था। वो धूंसे की जगह मुझे चाकू या गोली भी मार सकता था।

यहां मेरे साथ जो कुछ हुआ उसे सीधा-सपाट लिख रहा हूं। वो, जो उस वक़्त मैंने महसूस किया। जो अनुभव किया। उसे दर्द के चलते अभी बयान नहीं कर पा रहा हूं। हां, ray ban का अपना वो चश्मा बहुत मिस कर रहा हूं। बहुत समय इंतज़ार के बाद ले पाया था उसे।

Saturday, July 10, 2010

ग़ज़ल कहने की ख़ता माफ़ हो...।

अब अपना किसको कहोगे मियां मुस्कान तुम,
कि ज़माना देखके, पकड़े खड़े हो कान तुम।

लो भुगतो, कि आ गई मुफ़लिसी तुम पर,
तमाम उम्र तो बघारते रहे हो शान तुम।

तुम चबाते हो अपने होंठ परेशां होकर,
लोग समझते हैं खाते हो बहुत पान तुम।

एक मासूम सा बच्चा तुम्हारे भीतर है,
इस बच्चे की न ले लेना, कभी जान तुम।

मैं भला तो जग भला, अमां यार छोड़ो भी,
सूरत से दिखते हो, या वाकई हो नादान तुम।

रोटी, कपड़ा और मकान, बातों से नहीं मिलते हैं,
बड़े ठाठ से रहते हो बना के ख़्वाबिस्तान तुम।

ना रोते ना हंसते हो, ना हिलते ना डुलते हो,
सच को सुनकर गोया हो गए कब्रिस्तान तुम।।

Monday, June 21, 2010

मैं भी तो कविता कहता था।

सालों बाद कोई कविता लिखी थी... यही कोई दस साल बाद... मन के दर्द सहते विचार उद्धेलित होकर जमा हो गए थे, उन्ही के बिखराव को शायद कविता कहने की यह भूल भी हो सकती है...आज इसे लिखे जाने के तीन साल बाद पढ़ा तो कुछ लाइनें और उभर आईं...

कविता कह लीजिए या कुछ और..., जो भी है, प्रस्तुत है-



मैं भी तो कविता कहता था।
जब पांव धरा पर रहता था।।

जब शीत पवन सहलाती थी,
जब घटा मुझे फुसलाती थी,
बारिश आकर नहलाती थी,
कागज की नाव बुलाती थी,
जब संग नदी के बहता था,
मैं भी तो कविता कहता था।

आने को कहकर चली गई,
फिर न आई वो, चली गई,
मैंने सोचा मैं छला गया,
वो समझी कि वो छली गई,
जब विरह अकेला सहता था,
मैं भी तो कविता कहता था।

अब धुन है रुपयों-पैसों की,
सुनता हूं कैसे-कैसों की,
बेसुध से मेरे जैसों की,
कब कद्र है ऐसे-वैसों की,
जब अपनी सुध में रहता था,
मैं भी तो कविता कहता था।

अब कर्ज़ कई, अब मर्ज़ कई,
संग उम्र के बढ़ते फ़र्ज़ कई,
जीवन धुन, तानें बिगड़ गईं,
एक मुखड़े की हैं तर्ज़ कई,
जब अपनी धुन में रहता था,
मैं भी तो कविता कहता था।


जब पांव धरा पर रहता था।
मैं भी तो कविता कहता था!!!!

Thursday, June 17, 2010

"यार, यहां पर बड़ी Politics हो रही है।"

मुझे नफ़रत हैं ऐसे लोगों से। लेकिन क्या करें, कुछ लोगों की दुकानदारी ही ऐसे चलती है। वो उस मछली के किरदार में होते हैं जो पूरे तालाब को सड़ा देती है। जिनका स्वार्थ ही दूसरों को छोटा साबित करके ख़ुद को बड़ा बनाना है। और आख़िर में अपनी आदत से मजबूर होकर वो अपने ज़मींदोज़ होने का मार्ग प्रशस्त कर लेते हैं।

आप किसी भी सरकारी या गैर सरकारी दफ़्तर में काम करते हों। ज़रा बताइए, कितने लोग हैं आपके दफ़्तर में जो अपनी नौकरी से संतुष्ट हैं। अरे, लोग जिसकी नौकरी करते हैं, उसी को गाली देते फिरते हैं। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। लोग परस्पर किसी भी मुद्दे पर असहमत हों लेकिन अपने नौकरी और बॉस को लेकर कामोबेश सभी एक दूसरे से सहमत होते हैं। सभी का ‘संस्थागत मानसिक स्तर’ ख़तरे के निशान से ऊपर ही रहता है। सरकारी नौकर अपने अधिकारी से परेशान और प्राइवेट वाले अपने बॉस से। ये ना नौकरी के सगे होते हैं और ना अपने।

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि ऑफ़िस में लोगों को अपना बॉस हिटलर का बेवकूफ़ क्लोन क्यों नज़र आता है? कर्मचारियों का मानना होता है कि बॉस तो कर्मचारियों को मज़दूर समझता है। दफ़्तर के सर्वाधिक नाकारे लोग बॉस को गाली देते फिरते हैं। जिनके पास काम होता उन्हे बॉस और सहकर्मियों को गाली बकने का समय नहीं मिल पाता, लिहाज़ा वो घर आकर अपनी व्यस्तता का frustration अपने बीवी-बच्चों पर निकलाते हैं। बॉस कितना भी अच्छा क्यूं ना हो कभी प्रशंसा का पात्र नहीं बन पाता।

पता नहीं क्यूं, हर तरह का कर्मचारी अपने को शोषित मानता है। जो कुछ काम नहीं करते वो कहते फिरते हैं कि मेरी प्रतिभा को यहां कुचला जा रहा है, मुझे मौक़ा ही नहीं दिया जाता, मौक़ा मिलते ही मैं तो जंप मार जाऊंगा। कोई और धंधा पानी शुरू करूंगा। और जिनसे काम लिया जाता है, वो भी यही कहते घूमते हैं कि मेरा शोषण हो रहा है, वेरी वॉट लगा रखी हैं, गधों की तरह मुझसे काम लिया जाता है, मौक़ा मिलते ही मैं तो जंप मार जाऊंगा।

ना जाने क्यूं कुछ लोग अपने जिस दफ़्तर को जहन्नुम बताते फिरते हैं, उसे ये जानते हुए भी नहीं छोड़ना चाहते कि उनके ना रहने से कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं। वो जन्म भर की तरक्की की उम्मीद वहीं रहकर करते हैं, उनकी प्रतिभा भी पहचान ली जाए, सारे महत्वपूर्ण काम उन्ही से कराए जाएं, उनकी तनख्वाह भी उनके मन मुताबिक हर साल बढ़ा दी जाए, उनके अलावा किसी और को भाव ना दिया जाए और फिर वो ग्रैचुइटी के साथ पेंशन भी वहीं से पाएं। अरे भाई, आप इतने ही प्रतिभावान हैं तो कहीं और किस्मत क्यों नहीं आज़माते। अपनी नौकरी को गाली भी बकेंगे और रहेंगे भी वहीं। ये भी ख़ूब है।

कुछ लोगों को हमेशा लगता है कि सबसे ज़्यादा काम तो वही करते हैं, फिर भी उनकी तनख़्वाह इतनी कम है और बाक़ी सारे तो बस गुलछर्रे उड़ाने की सैलरी पाते हैं। काम मैं करता हूं और पैसे दूसरों को मिलते हैं। .....छोड़ूंगा नहीं।

ऐसे ही कितने ही प्रतिभावान लम्मपट दूसरों की तरक्की में टंगड़ी लड़ाने के चक्कर में अपनी ही छीछालेदर कर बैठते हैं। क़ाबलियत के दम पर किसी से आगे निकलने के बजाए, टांग अड़ाकर दूसरों को गिराने की कोशिश करते हैं। ना ही वो बड़े बन पाते हैं और हमेशा इस ग़लतफ़हमी में भी रहते हैं कि उन्होंने दूसरों को बड़ा नहीं बनने दिया।

राजनीति.......! यार, यहां पर बड़ी politics हो रही है। उनकी ज़ुबां पर बस यही डॉयलाग होता है। और politics सच में शुरू हो जाती है।

यहां राजू श्रीवास्तव का एक चुटकुला सार्थक रहेगा। राजू भाई कहते हैं कि जैसे पुरातन काल के अवशेष आज ज़मीन से निकलते हैं और फिर उनका अध्ययन होता है, वैसे ही आज की चीज़े कई सौ साल बाद निकलेंगी। कई सौ साल बाद जब ज़मीन से CD और DVD निकलेंगी तो अनुमान लगाया जाएगा कि ये निश्चित ही मनुष्य के खाना परोसने की थाली रही होगी। फिर कोई कहेगा कि अगर ये थाली रही होगी तो इसमें छेद कैसे हो गया है? .............फिर शोध का नतीजा निकलेगा कि मनुष्य जिस थाली में खाता था उसी में छेद करता था।

Monday, June 14, 2010

इमोश्नल अत्याचार....!


अभी-अभी एक हवाईजहाज़ सिर के ऊपर से उड़ कर निकला है। साल भर पहले जब पहली बार सचमुच हवाईजहाज़ में बैठा तो एहसास हुआ कि बचपन में इस हवाईजहाज़ ने भी कितना इमोश्नल अत्याचार किया है हम पर। मन में, पापा से मिलने की कितनी बड़ी उम्मीद जगाई थी इसने, जो आगे चलकर जीवन की उलझनों को सुलझाने में पता नहीं कब और कहां गुम हो गई।

बचपन में स्कूल जाते हुए नन्ही बहन पूछा करती थी कि ‘भईया, पापा हमारे पास नहीं आ सकते तो क्या हम भी पापा के पास नहीं जा सकते?’

- ‘पापा, भगवान जी के पास चले गए हैं पागल।’
- ‘तो क्या भगवान जी के पास अपन नहीं जा सकते, बोलेंगे हम पापा से मिलने आए हैं, हमारे पापा यहां आ गए हैं। प्लीज़ मिलवा दीजिए हमारे पापा से।’ वो मासूमियत से पूछती।
- ‘जा सकते हैं शायद, प्लेन में बैठकर जा सकते हैं, लेकिन उसके लिए बहुत सारे पैसे लगते हैं। एक दिन जाएंगे, ज़रूर।’
- ‘नहीं.... अभी चल ना मुझे मिलना है पापा से।’

और नन्ही बहना आसमान में उड़ते एरोप्लेन को देखकर रोने लगती। स्कूल पास आते ही मैं उसे टीचर का डर दिला कर चुप करा देता। वो आंसू पोछकर चुप तो हो जाती थी लेकिन उसकी उसकी सुबकियां क्लॉस में दाखिल होने तक जारी रहतीं। ऐसा लगभग रोज़ ही होता था। क्योंकि स्कूल के पास ही खेरिया हवाईअड्डा था और थोड़े-थोड़े अंतराल पर वहां से हवाईजहाज़ होकर गुज़रते थे। किसी-किसी रोज़ तो बहन पापा को याद करके रोते-रोते ‘मम्मी के पास जाना है’ की ज़िद पकड़ बैठती थी। फिर उसे उस रिक्शे में ही वापस भेजना पड़ता था।

मैं तब चौथी क्लास में था और बहन पहली क्लास में। हम दोनों भाई-बहन एक साथ साईकिल रिक्शा में स्कूल जाते थे। स्कूल, आगरा का केन्द्रीय विद्यालय न. 1। घर से कोई आठ किलोमीटर दूर।

पिता के देहांत के बाद हम नागपुर से आगरा चले आए थे। हालत ही कुछ ऐसे बने कि नाना-नानी मां को उसके ससुराल वालों के साथ नहीं छोड़ सकते थे। उन्होने कभी ख़ुद भी इच्छा जाहिर नहीं की मां को अपने साथ ले जाने की। वजह थी पापा की नौकरी। पापा के बाद किसे मिले उनकी नौकरी। दादी चाहती थीं कि नौकरी मेरे बेरोज़गार चाचा को मिले। नाना-नानी चाहते थे कि नौकरी मेरी मां को मिले, जिससे हम भाई-बहन की परवरिश ठीक से हो जाए। हालांकि मां ने पापा के जीते-जी कभी घर से बाहर निकल कर नौकरी के बारे में सोचा तक नहीं था। हालात सब कुछ करवा देते हैं, नौकरी मां को मिली। और मां के ससुराल वाले इस बात से नाराज़ होकर इस हाल में उसे और अकेला कर गए। पिता की मृत्यू के बाद मां की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। 28 साल की थी मेरी मां जब पापा इस दुनिया से गए। मेरी बहन को तो पापा का चेहरा तक याद नहीं। उनके साथ बिताया एक पल भी याद नहीं। मेरी यादों में फिर भी पापा के लाड़-प्यार के कुछ धुंधलके ज़रूर आज भी उमड़ते घुमड़ते हैं।

हार्ट अटैक आया था पापा को। रात को सोते समय पलंग से गिर पड़े थे। मां की गोद में आख़िरी सांस ली। मां ने पापा के चेहरे पर पानी के छींटे मारे, हाथेलियों और तलवों को रगड़ा, लेकिन पापा फिर नहीं जागे। मुझे नहीं पता था पापा अब नहीं लौटेंगे। बहन को तो इतना भी नहीं पता था। हम दोंनो बस मां को देखकर रोए जा रहे थे। मुझे लगा पापा बीमारी में बेहोश हो गए हैं, हॉस्पिटल से ठीक होकर आ जाएंगे। लेकिन वो ना ठीक हुए ना वापस आए।

उनके दाह संस्कार का वो पल मेरे बालमन के लिए सबसे ज्यादा पीड़ादायक था। पापा मेरे सामने थे। मौन। चिरनिद्रा में। वो जाग जाते तो सब ठीक हो जाता। लेकिन....। मैंने रोते हुए पता नहीं किससे कहा था कि पापा के उपर इतनी भारी लकड़ियां मत रखिए प्लीज़! पापा को बहुत चोट लग रही होगी, दर्द हो रहा होगा। मुझे वहां से कुछ देर के लिए हटा दिया गया। फिर कुछ देर बाद पापा को मुखाग्नि देते हुए समझ नहीं पा रहा था कि पापा हमें छोड़कर क्यूं चले गए। जबकि टॉयलेट और ऑफ़िस जाने के सिवा पापा कभी हमें अकेले नहीं छोड़ते थे।

आजतक नहीं समझ पाया हूं कि पापा क्यूं चले गए। आज भी पग-पग पर पापा की ज़रूरत महसूस होती है। उनकी कमी खलती है। उम्र और समझ के साथ मेरी और बहन की वो उम्मीद भी कब की टूट चुकी है कि पापा से मिलने हवाईजहाज़ से जाना मुमकिन है।

साल भर पहले जब पहली बार हवाईजहाज़ में बैठा तो सोचा कि इस हवाईजहाज़ ने भी कितना इमोश्नल अत्याचार किया है हम भाई-बहन पर। और मुस्कुरा दिया। मैं ज़मीन से कई हज़ार फीट की ऊंचाई पर था, लेकिन पापा से फिर भी बहुत दूर.....। आज भी जब कोई हवाईजहाज़ उड़ता देखता हूं तो बचपन की उन यादों का मेला लग जाता है कुछ देर के लिए।