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Wednesday, May 26, 2010

भगवान के नाम पे...

नौ साल का करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में।


भाई साहब, बालाजी मंदिर वालों ने 1070 किलो सोना बैंक में जमा कराया है पिछले दिनों। भक्तों ने चढ़ावे में चढ़ाया था सोना। मैं तो ख़बर सुनकर ही मालामाल हो गया। यही तो कलयुग है। इधर भक्तों का इन्क्रीमेंट तक अटका हुआ है, और उधर भगवान बिलियनेयर होते जा रहे हैं। बालाजी तो खैर सबसे अमीर भगवान हैं ही लेकिन बाक़ी के भगवान लोग भी कम मज़े में नहीं हैं। ये कैसी विडंबना है प्रभु, भक्त भरोसे भगवान मालामाल और भगवान भरोसे भक्त कंगाल। हे भगवान, ये क्या हो रिया है?

भगवान तो भगवान, भगवान का गुणगान करने वालों की भी कम ऐश नहीं है। आपने कभी जिस महाराज का नाम तक नहीं सुना वो भी कथा बांचने के लिए एक साथ हज़ारों भक्तों को क्रूज़ पर ले जाते हैं। लंदन, पेरिस और न्यूयार्क की हवाई यात्राएं कराते हैं। कोई क्रूज़ पर कथा बांच रहा है तो कोई 50,000 हज़ार फीट की उचांई पर भजन कीर्तन कर रहा है। नारायण...नारायण। जो कभी किसी चैनल पर प्रवचन करते थे उन्होने वो चैनल ही खरीद मारे। जो कभी भगवान के वंदन के साथ इस फील्ड में उतरे थे, वो ख़ुद ही भगवान बन बैठे। परमपूज्यपाद हो गए, प्रातःस्मरणीय कहलाने लगे।

नौ साल पहले एक भारी भूल ना की होती तो मैं भी आज एक जाना माना घुटा संत होता। अरे कुछ नहीं..., आस्था चैनल के लिए एक कथावाचक महाराज के प्रवचनों की डील कराई थी। नौ लाख़ की डील थी, जिसमें मेरा कमीशन 90,000/- था। कोई लिखित कांट्रेक्ट हुआ नहीं था, पूरी डील वायदा कारोबार के तहत हुई थी। खा गया गच्चा। फंस गया कमीशन। आज नहीं कल, कल नहीं महीने भर बाद, महीने नहीं साल भर... हार कर मैं पहुंच गया मुंबई। मालिक से मिलने। पैसे मांगे तो बोले-‘अरे 90,000 रुपए लेकर क्या करेंगे अनुराग जी, आप तो करोड़ों के आदमी हैं। क्या दमदार आवाज़ है आपकी। चलिए हम आपको आस्था पर स्लॉट देते हैं और तीन महीने का समय... कराना आपको ये है कि रामायण और महाभारत को अंग्रेज़ी में नाट्य पटकथा के रूप में कंठस्थ कर लीजिए। तीन महीने बाद चैनल पर आपके प्रवचन प्रारंभ। पैसा हमारा.. दमदार आवाज़ में प्रस्तुति आपकी। साल भर में ही करोड़पति हो जाएंगे आप। महाराज होने का तमगा अलग।’

लोग आंखों में सपने सजाकर मुंबई जाते है और मैं मुंबई से आखों में सपने सजाकर लौट रहा था। प्रस्ताव के बारे में पता चलते ही घर में रोआ-चिल्लाट मच गई। मां छाती पीट-पीट कर रोने लगी-‘अरे, क्या इसी दिन के लिए पैदा किया था तुझे कि एक दिन बाबा बन जाए। नहीं बेटा नहीं... बस ये मत करना... तुझे मेरी क़सम।’ पिता के देहांत के बाद मां ने मुझे बड़ी मुश्किलों से पाला है। सो मैं उसके रुदन पर पसीज गया। बाबाजी बनने का आइडिया मां के आंसूओं में डाइलियूट हो गया।

आज बड़ा अफ़सोस होता है भाई। नौ साल का टनाटन करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में। मस्त लाइफ़ कट रही होती। और हां, धन-दौलत, ऐश-ओ-आराम और वैभव देखकर शायद मां को भी कोई शिकायत नहीं होती। वो नौ साल पहले भी मेरी मां थी और आज भी मेरी मां है। आस्था का प्रपोज़ल मान लिया होता तो वो भी सिर्फ मां ना रहती। अरे भाई गुरूमां हो गई होती। क्या ख़्याल है आपका...?


और हां, एक स्वर्णिम करियर से तो मुझे हाथ धोना ही पड़ा, वो 90,000 रुपए भी गए सो अलग।

7 comments:

माधव said...

in the name of God
all is Fair and

all is well

honesty project democracy said...

अनुराग जी आपकी सच्चाई को जानकर अच्छा लगा / रही बात बालाजी और इन ढोंगी बाबाओं की तो इनसे हर सच्चा और इमानदार इन्सान वाकिफ है / बालाजी को भी इन ढोंगियों ने नकली बना दिया है जिससे असली भक्त बाला जी जाने के वजाय यहीं से प्रणाम कर उनको कहते है" हे प्रभु तेरी यह क्या लीला है ,तो उधर से जवाब आता है ये सारे सोना चढाने वाले महा पापी हैं और इनको हमने ही मोह कर अपने मंदिर बुलाया है ,आज से इनकी सजा का सिलसिला प्राम्भ होगा ,हाँ जो गरीबों को दान में अपनी सारी संपत्ति दे देगा उसको सजा में छूट मिल सकती है " जय हो बालाजी / नाश हो इन ढोंगी बाबाओं का /

Udan Tashtari said...

अभी भी देर नहीं हुई है, अब से लग लो!! :)

zeal said...

@-बाबाजी बनने का आइडिया मां के आंसूओं में डाइलियूट हो गया।..

Anurag ji,
Glad to know you listened to your mother.

Worthy son of a worthy mother.

Gone are the days when so called 'babas' had some value. People are aware now.

Divya

ajit said...

ये वाकई आपबीती है या फिर ....बढ़िया लिखा है हमेशा की तरह .मैंने तो सहारा में तुम्हारे व्यंग्य लेखन के जरिए ही तुम्हें जाना था और कई लोगों से पता करने की कोशिश की थी कि ये अनुराग मुस्कान कौन है ...

ANURAAG MUSKAAN said...

ये बिलकुल सच्चा क़िस्सा है अजीत जी... बिलकुल ऐसा ही हुआ था। उस वक़्त श्री माधवकांत मिश्रा जी आस्था के लिए उत्तर भारत का काम देखा करते थे। ये डील उन्ही के साथ हुई थी। आजकल वो विशुद्ध रूप से धर्माचार्य होकर समाज के नवनिर्माण की दिशा में व्यस्त हैं। पंडित जी मेरे साथ हुई इस दुर्घटना के गवाह हैं।

विनोद कुमार पांडेय said...

आज कल सब बिजनेस बन चुका है...बढ़िया रचना..धन्यवाद अनुराग जी