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Friday, May 28, 2010

कुंए के मेंढ़क

एक कुआं था साहब। पानी कम कीचड़ ज्यादा वाला। कुएं में करोड़ों मेंढ़क रहा करते थे। मेंढ़कों को कुएं का सभ्य एवं सम्मानित नागरिक होने पर बड़ा गर्व था। छाती फुलाए-फुलाए इतराकर यहां-वहां गाते फिरते थे, 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का.....इस देश का यारों क्या कहना..टर्रर्रर्रर्रर्रर्र...' इमोश्नल होकर सभी मेंढ़क उस कुएं को 'लोकतंत्र का कुआं' कहते थे। और कुएं से बाहर के सभी जीव-जन्तु उन मेंढ़कों को इमोश्नल फूल। कुएं में हर तबके, हर वर्ग और हर धर्म के मेंढ़क रहते थे। कुछ मेंढ़क जिन्होने अपने सिर पर सफेद टोपी पहन ली वह नेता मेंढ़क कहलाने लगे और उन्होने ने जिन्हे टोपी पहनायी वह कहलाये जनता मेंढ़क। कुएं में लोकतंत्र हो, नेता हो और जनता हो तो यह भला कैसे संभव है कि संसद न हो। तो साहब, कुएं के बीचों-बीच एक संसद भी थी।

तो भईये, कुएं की राजनीति में दो ही पार्टियों की टर्र-टर्र ज्यादा बोलती थी। एक 'कुएं के मेंढ़क पार्टी' और दूसरी 'बरसाती मेंढ़क पार्टी'. कुएं की मेंढ़क पार्टी का चुनाव चिन्ह पैर के पंजे का निशान था। हाथ के पंजे का इसलिए नहीं था क्योंकि वह पहले ही किसी और पार्टी के नाम आवंटित था। पैर का पंजा भी कोई बुरा चुनाव चिन्ह नहीं था। कम से कम पार्टी यह सोच कर तसल्ली में थी कि कीचड़ में पैर खराब करना कीचड़ में हाथ गंदे करने से कहीं ज्यादा बेहतर है। वैसे भी पैर के पंजे से ऐसी-ऐसी खुराफातें की जा सकती हैं जिसकी खबर अपने हाथ तक को न होने पावे। शुभ कामों में सत्यानाश मचाने के लिए पैर का पंजा की अड़ाया जाता है। सो पार्टी बेफ्रिक हो ली।

ऐसे ही, बरसाती मेंढ़क पार्टी का चुनाव चिन्ह था सिंघाड़ा। कमल का फूल इसलिए नहीं क्योंकि वह भी पहले ही किसी और पार्टी के नाम आवंटित था। सिंघाड़ा चुनाव चिन्ह आवंटित होते ही कुएं के मेंढ़क पार्टी को कुएं में पसरी कीचड़ में असीमित संभावनायें नजर आने लगीं। कीचड़ में सिंघाड़े का भविष्य उतना ही उज्जवल था जितना कि कमल का होता है। कुल मिलाकर इन दोनों के अलावा सभी राजनैतिक पार्टियों का प्रमुख एजेंडा 'कीचड़' ही था। नेता मेढ़कों की ओर से विचारधारा, अनुशासन और नैतिकता के नाम पर तब तक पानी किया जाता था जब तक उसकी फिसलन में जनता मेंढ़क फिसल-फिसल कर औंधे मुंह न रपटने लगें। कभी-कभी तो नेता मेंढ़क खुद अपने ही मुंह पर कीचड़ मलते और नाम दूसरी पार्टी का लगाते। राजनीति में कीचड़ और कीचड़ में राजनीति, नेता मेंढ़कों का नया संविधान था।

वैसे, कीचड़ की राजनीति करने वाले मेंढ़कों की हर पार्टी में पौ-बारह रहती है। नेता मेंढ़कों की तोंद जरूरत से ज्यादा बाहर नजर आती है और जनता मेंढ़क राजनीति की प्रयोगशाला में बारी-बारी से पेट चीरने के काम में लाए जाते हैं। अंत में पानी कम कीचड़ ज्यादा वाले इस कुएं के लोकतंत्र में छंटे हुए मेढ़कों की सत्ता अपना स्वर्णिम युग जीती है।

ये 'लोकतंत्र का कुंआ' बडा व्यापकता लिए हुए है जनाब। नज़र घुमाइए, आपको अपने आसपास ही मिल जाएगा। मिला क्या...?

8 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

bilkul sahi kaha aapne

hum sab kuye ke medhak hi hain

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

honesty project democracy said...

नेता मेंढ़कों की तोंद जरूरत से ज्यादा बाहर नजर आती है और जनता मेंढ़क राजनीति की प्रयोगशाला में बारी-बारी से पेट चीरने के काम में लाए जाते हैं। अंत में पानी कम कीचड़ ज्यादा वाले इस कुएं के लोकतंत्र में छंटे हुए मेढ़कों की सत्ता अपना स्वर्णिम युग जीती है।

वाह अनुराग जी क्या बात कही ,लेकिन इससे छुटकारा पाने का कुछ उपाय भी बताते तो सबके लिए न सही कुछ के लिए तो फायदेमंद हो ही सकता था !!!!आप तो वैसे भी जमीन से जुड़े हुए नागरिक हैं /

Jandunia said...

बहुत सुंदर पोस्ट

माधव said...

we all are frog in the well

सुनील दत्त said...

रोचक

sangeeta swarup said...

सटीक...

Mithilesh dubey said...

ओह हो , इतनी रोचक कथा

Anonymous said...

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