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Thursday, May 27, 2010

मैं ‘मुस्कान’ कैसे हुआ..

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि भईए, ये ‘मुस्कान’ क्या है? आज बता ही देता हूं।
द्वारिका प्रसाद माहेश्रवरी जी का नाम तो सुना ही होगा आपने। उनकी कविताएं ‘उठो लाल अब आंखे खोलो, भोर भई अब मुख को धो लो...’और 'वीर तुम बढ़े चलो..', शायद ही किसी ने अपने छुटपन में ना पढ़ी हो। ये नाम ‘मुस्कान’ मुझे उन्ही द्वरिका प्रसाद माहेश्रवरी जी ने दिया है। किस्मत से मैं भी दादा के शहर आगरा में रहता था। उन दिनों कविता लिखने का शौक परवान चढ़ रहा था, कवि मित्रों के साथ ख़ूब गोष्ठियां भी हुआ करती थीं। अहो भाग्य, जो इसी क्रम में दो तीन बार दादा की अध्यक्षता में हुए कवि सम्मेलन में मुझे भी कविता पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। ये कोई 1992-93 की बात है। तब मैं अनुराग सक्सेना के नाम से ही मंचों पर काव्यपाठ किया करता था और अख़बारों में भी इसी नाम से मेरे लेख और कविताएं प्रकाशित होते थे। दादा के साथ कविता पाठ करना गौरव की बात थी। एक दिन दादा के बगल में ही बैठ गया। तभी संचालक ने एक कवि को उनके तख़ल्लुस यानि उपनाम के साथ आमंत्रित किया। कवि महोदय का उपनाम अत्यंत हास्यास्पद था, सो सब हंस पढ़े। दादा भी हंस दिए। मैंने माहेश्रवरी जी से पूछा कि दादा आपने कोई उपनाम क्यों नहीं रखा? वो बोले- ‘अमां यार, हमारे दौर में कुल जमा 7-8 कवि हुआ करते थे, अब आजकल तो श्रोताओं से ज़्यादा कवि हुआ करते हैं। हमें पहचान के लिए किसी उटपटांग नाम की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब तो ऐसे ही नामों से कवियों कि पहचान होती है। कोई अपने नाम के साथ गिलहरी जोड़े हुए है, कोई सूंड़, पटाखा, भोंपू, सांड और भी ना जाने क्या-क्या। तुम भी कुछ लगाते हो क्या?’

‘नहीं दादा लगाता तो नहीं हूं लेकिन सोच रहा हूं लगा लूं.... दोस्त लोग कहते हैं कि बड़ी चुभने वाली कविताएं कहता हूं, तो ‘कांटा’ या ‘सुई’ या फिर इन जैसा कोई तख़ल्लुस रख लो लेकिन मुझे ये सब पसंद नहीं...’ थोड़ा पॉज़ लेकर मैंने कहा ‘दादा आप कि कोई नाम सुझा दीजिए ना।’ वो बोले- ‘अच्छा एक दिन को अपनी डायरी दो... कल घर आकर ले जाना... पढ़कर बताता हूं क्या उपनाम हो सकता है।’

अगले दिन मैं दादा के घर डायरी लेने पहुंचा। डायरी देते हुए दादा बोले-‘यार, बहुत रोता है तू (कविताओं में) कम से कम नाम ही ‘मुस्कान’ रख ले।’ और मैं मुस्कान हो गया। फिर काफ़ी समय तक अनुराग सक्सेना ‘मुस्कान’ के नाम से लिखता रहा लेकिन फिर दोस्तों की सलाह पर सिर्फ ‘अनुराग मुस्कान’ कर लिया।

बालकवि द्वारिका प्रसाद माहेश्रवरी ओजस्वी कवि थे। ये उन्ही को ओज है कि मैं आज रोतड़ू से मुस्कान हो गया हूं।

5 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

रोचक जानकारी।

माधव said...

interesting fact

sangeeta swarup said...

भाग्यशाली हैं आप जो ऐसे महान कवि की छत्रछाया मिली...

anupam mishra said...

अजीब दास्तां है ये कहां शुरु कहां ख़तम...

फ़िरदौस ख़ान said...

तख़ल्लुस तो वाक़ई बहुत शानदार है...मुबारक हो... इतने साल बाद...क्योंकि उस वक़्त तो हम मुबारकबाद दे ही नहीं पाए थे... देर आयद दुरुस्त आयद...